

Ashtabhuja Ganesh Temple Rajnandgaon: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में एक अनोखा गणेश मंदिर स्थित है। यहां स्थित अष्टभुजी गणेश प्रतिमा का कभी विसर्जन नहीं होता। वर्ष 1884 से यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना की जा रही है। मंदिर निर्माण के समय 25 युवक भी प्रतिमा नहीं हिला सके थे। अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिमा को केवल जल से स्नान कराते हैं।
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव-खैरागढ़ मार्ग पर गोपालपुर गांव स्थित है। इस गांव में भगवान गणेश का बेहद प्रसिद्ध मंदिर है। यहां आठ भुजाओं वाली प्राचीन पाषाण प्रतिमा विराजमान है। ग्रामीण इस प्रतिमा को स्वयंभू मानते हैं।
आमतौर पर गणेश उत्सव के बाद प्रतिमा विसर्जित की जाती है। परंतु इस मंदिर में विसर्जन की कोई परंपरा नहीं है। यहां 11 दिनों तक उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। अंतिम दिन बप्पा को केवल दो बाल्टी जल से स्नान कराते हैं। फिर विशेष पूजा के साथ उत्सव का समापन कर दिया जाता है।
वर्ष 2006 में इस मंदिर का नए सिरे से निर्माण हुआ। प्रतिमा पहले एक नीम के पेड़ के नीचे रखी थी। इसे नए गर्भगृह में स्थापित करने की योजना बनाई गई। गांव के करीब 25 युवकों ने इसे उठाने की कोशिश की। काफी प्रयास के बाद भी प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली। इसके बाद प्रतिमा को बैलगाड़ी से खींचने का प्रयास हुआ।
बैलगाड़ी से ले जाने की कोशिश भी पूरी तरह असफल रही। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसके बाद सेवक को स्वप्न आया। फिर विशेष धार्मिक विधि-विधान से प्रतिमा स्थापित की गई।
इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन और ऐतिहासिक माना जाता है। गोपालपुर गांव का संबंध सीधे खैरागढ़ राजवंश से रहा है। सन 1700 के आसपास यह क्षेत्र खैरागढ़ रियासत में आता था। राजा टिकैतराय के शासनकाल से इसका ऐतिहासिक संबंध जुड़ता है। प्रतिमा की स्थापना 1884 में नागवंशी शासक उमराव सिंह काल में हुई।
इसके बाद सूबेदार ठाकुर प्रकाश सिंह गहरवार ने जिम्मेदारी संभाली। उनके वंशजों ने पूजा और सेवा की परंपरा आगे बढ़ाई। आज भी वही प्राचीन परंपराएं पूरी निष्ठा से निभाई जाती हैं।