दीपावली के बाद जीवंत होती है छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा, गौरा-गौरी पूजा और अन्नकूट में दिखता है मिट्टी से जुड़ाव

Gaura-Gauri Puja: दीपावली के बाद यहां मनाया जाने वाला गौरा-गौरी पर्व और अन्नकूट उत्सव छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत की अनूठी पहचान हैं। पर्व में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव देखने को मिलता है।
Chhattisgarh news, chhattisgarh festival News,
गौरा-गौरी पर्व (सोर्स - नवभारत लाइव)
Published on: 
Updated on: 

Highlights

  • लोकआस्था, पारिवारिक मंगलकामना और कृषि संस्कृति का अनूठा संगम।

  • नई पीढ़ी तक पहुंच रही सदियों पुरानी परंपराएं।

  • लोक पंरपरा में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव।

  • शिव को गौरा और माता पार्वती को गौरी के रूप में होती है पूजा।

Chhattisgarh Gaura-Gauri Puja: छत्तीसगढ़ की पहचान केवल धान के कटोरे के रूप में ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं के लिए भी है। दीपावली के बाद यहां मनाया जाने वाला गौरा-गौरी पर्व और अन्नकूट उत्सव इसी सांस्कृतिक विरासत की अनूठी पहचान हैं। इन पर्वों में धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक सुख-समृद्धि, सामाजिक एकता, खेती-किसानी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव देखने को मिलता है।

आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद छत्तीसगढ़ के गांवों और नगरों में इन परंपराओं का निर्वहन आज भी उत्साह और श्रद्धा के साथ किया जाता है।

दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा

गोरा-गौरी पर्व छत्तीसगढ़ की विशिष्ट लोकपरंपराओं में शामिल है। इसमें भगवान शिव को गौरा और माता पार्वती को गौरी के रूप में पूजा जाता है। दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा के अवसर पर कई क्षेत्रों में मिट्टी से गोरा-गौरी की प्रतिमाएं तैयार कर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।

Chhattisgarh news, chhattisgarh festival News,
बिलासपुर में एक के बाद एक दो इलेक्ट्रॉनिक शॉप में लगी आग, दिवाली की खरीदारी करने पहुंचे लोगों में मचा हड़कंप

इस दौरान लोकगीतों, मंगलगान और पारंपरिक रस्मों के माध्यम से लोकसंस्कृति की सुंदर झलक दिखाई देती है। मान्यता है कि गोरा-गौरी की पूजा से परिवार में सुख-शांति, दांपत्य जीवन में मधुरता और घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है। यह पर्व सामाजिक मेल-मिलाप और सामूहिक सहभागिता का भी अवसर बनता है।

अन्नकूट उत्सव की भी विशेष धार्मिक महत्ता

इसी अवसर पर अन्नकूट उत्सव की भी विशेष धार्मिक महत्ता है। अन्नकूट का अर्थ है अन्न का समूह या ढेर। इसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को प्रकृति, गोवर्धन पर्वत और पशुधन के महत्व का संदेश दिया था। इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण किया था।

Chhattisgarh news, chhattisgarh festival News,
बलौदाबाजार करंट हादसे में तीसरी मौत, कपड़ा कारोबारी की पत्नी वर्षा गुप्ता ने भी तोड़ा दम, शहर में शोक की लहर

इसी प्रसंग की स्मृति में गोवर्धन पूजा की परंपरा प्रचलित हुई। इस दिन घरों और मंदिरों में तरह-तरह के पकवान, सब्जियां, मिठाइयां और मौसमी व्यंजन बनाकर भगवान को अर्पित किए जाते हैं। कई स्थानों पर छप्पन भोग लगाने और सामूहिक प्रसाद वितरण की परंपरा भी है।

किसान के परिश्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर

छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति में अन्नकूट का महत्व विशेष रूप से दिखाई देता है। यहां धान केवल फसल नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका का आधार है। किसान पूरे वर्ष मेहनत करके खेतों में अन्न उपजाते हैं। ऐसे में अन्नकूट का पर्व अन्न के प्रति सम्मान और किसान के परिश्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यह पर्व संदेश देता है कि अन्न की एक-एक दाना अनमोल है और उसकी बर्बादी नहीं होनी चाहिए। खेती में गाय-बैल सहित पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि गोवर्धन पूजा के साथ गौवंश और कृषि पशुओं के प्रति सम्मान का भाव भी जुड़ा हुआ है।

गांवों में सामूहिक आयोजन

इन पर्वों का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। गांवों में सामूहिक आयोजन, पारंपरिक गीत-संगीत, परिवारों का एकत्र होना और प्रसाद वितरण सामाजिक रिश्तों को मजबूत बनाते हैं। बुजुर्गों से नई पीढ़ी तक पहुंचती पूजा की विधियां और लोकगीत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का काम करते हैं। बदलते समय में जहां अनेक पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं, वहीं गोरा-गौरी और अन्नकूट जैसे पर्व अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए हैं।

दरअसल, गोरा-गौरी और अन्नकूट छत्तीसगढ़ की उस जीवनशैली का परिचय देते हैं, जिसमें धर्म, प्रकृति, परिवार, खेती और समाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गोरा-गौरी जहां दांपत्य जीवन, पारिवारिक मंगल और लोकआस्था का प्रतीक हैं, वहीं अन्नकूट अन्नदाता, पशुधन और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। यही वजह है कि दीपावली के बाद मनाए जाने वाले ये पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के जीवंत प्रतीक हैं।

Story - विनोद जैन