शरद पूर्णिमा पर रायगढ़ के मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में 60 बकरों की बलि! बैगा का खून पीने का वीडियो वायरल

Raigarh Maa Mankeshwari Devi Temple: रायगढ़ जिले के करमागढ़ स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी बल पूजा का आयोजन हुआ। इस दौरान करीब 60 बकरों की बलि दी गई।
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मां मानकेश्वरी देवी (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Highlights

  • शरद पूर्णिमा पर मां मानकेश्वरी देवी में मंदिर में निभाई गई 500 साल पुरानी परंपरा

  • रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी मां मानकेश्वरी देवी में लगा मेला।

  • मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु चढ़ाते हैं बकरा।

  • संतान प्राप्ति और बीमारी से मुक्ति की कामना लिए पहुंचे है श्रद्धालु।

Chhattisgarh Maa Mankeshwari Devi Temple: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में शरद पूर्णिमा के अवसर पर एक सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा निभाई गई। करमागढ़ स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी बल पूजा का आयोजन हुआ। इस दौरान करीब 60 बकरों की बलि दी गई। पूजा के बीच बैगा के बलि दिए गए बकरों का खून पीने का वीडियो भी सामने आया है, जिसकी चर्चा हो रही है।

मंदिर को रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी मां मानकेश्वरी देवी का धाम माना जाता है। यहां रायगढ़ के अलावा ओडिशा और आसपास के दूर-दराज के गांवों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि देवी से मांगी गई मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बकरा चढ़ाते हैं। इनमें संतान प्राप्ति और बीमारी से मुक्ति की कामना करने वाले लोग भी शामिल हैं।

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बैगा के शरीर में देवी के वास की मान्यता

मानकेश्वरी समिति के सदस्यों के मुताबिक, बल पूजा के दौरान गांव के बैगा के शरीर में देवी का वास होने की मान्यता है। इसी धार्मिक विश्वास के तहत बलि के बाद बैगा बकरों का खून पीते हैं। श्रद्धालु उनके पैर धोते हैं और सिर पर दूध डालकर पूजा करते हैं।

समिति के सदस्यों का दावा है कि इस प्रक्रिया का बैगा के शरीर पर कोई दुष्प्रभाव दिखाई नहीं देता। हालांकि, यह धार्मिक मान्यता है; इसके संबंध में किसी चिकित्सकीय निष्कर्ष का उल्लेख नहीं किया गया है।

बल पूजा से एक रात पहले होती है निशा पूजा

इस परंपरा में बल पूजा से एक रात पहले विधि-विधान से निशा पूजा की जाती है। इस दौरान रायगढ़ राजपरिवार की ओर से बैगा के अंगूठे में नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है। समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव के अनुसार, मान्यता है कि आम दिनों में ढीली रहने वाली यह अंगूठी बल पूजा के दिन बैगा के अंगूठे में कस जाती है।

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कभी 100 से ज्यादा बकरों की होती है बलि

समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने बताया कि यह परंपरा करीब 500 साल से चली आ रही है। इस बार लगभग 50 से 60 बकरों की बलि दी गई, जबकि कुछ वर्षों में यह संख्या 100 से 120 तक पहुंच जाती है।

पूजा के दौरान मंदिर के सामने बैरिकेडिंग की गई थी, ताकि व्यवस्था बनी रहे और केवल संबंधित श्रद्धालु तथा समिति के सदस्य ही निर्धारित क्षेत्र में प्रवेश कर सकें। पूजा के बाद करमागढ़ और आसपास के इलाके में मेले जैसा माहौल रहा।

राजपरिवार ने क्या कहा?

राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि मां मानकेश्वरी देवी की पूजा की परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के लोगों की देवी के प्रति गहरी आस्था है और आज भी पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया जा रहा है। करमागढ़ स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था और गोंडवाना परंपरा से जुड़ा माना जाता है। शरद पूर्णिमा पर होने वाली बल पूजा में हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

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