सुप्रीम कोर्ट। इमेज-सोशल मीडिया
Supreme Court News : छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई धर्म अपनाने वाले ग्रामीणों के अंतिम संस्कार को लेकर उपजा विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर छत्तीसगढ़ सरकार और स्थानीय प्रशासन को नोटिस जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि आदिवासी ईसाइयों को उनके अपने ही गांवों में दफनाने से रोका जा रहा है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है कि फिलहाल किसी भी शव को कब्र से बाहर नहीं निकाला जाएगा।
यह याचिका ‘छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वैलिटी’ की ओर से दायर की गई है। याचिका में 143 ऐसे परिवारों का विवरण दिया गया है, जिन्हें अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए भारी संघर्ष करना पड़ा। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि कुछ मामलों में पुलिस की मौजूदगी में शवों को कब्र से खोदकर निकाला गया और फिर गांव से करीब 50 किलोमीटर दूर दोबारा दफनाने के लिए भेजा गया। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि अदालत गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार को एक मौलिक अधिकार घोषित करे और राज्य सरकार को निर्देश दे कि धर्म या जाति के आधार पर श्मशान या कब्रिस्तान में भेदभाव न किया जाए।
छत्तीसगढ़ के बस्तर और आसपास के आदिवासी अंचलों में यह समस्या गहरी होती जा रही है। दरअसल, यहां के गांवों में अंतिम संस्कार की जगहें और रीतियां सदियों पुरानी सामुदायिक परंपराओं पर आधारित हैं। जब कोई परिवार ईसाई धर्म अपनाता है, तो उसकी अंतिम विदाई की पद्धति बदल जाती है। ग्राम सभा और पारंपरिक समुदाय का तर्क होता है कि धर्म बदलने के बाद व्यक्ति की जड़ें उस पारंपरिक कब्रिस्तान से कट जाती हैं, जबकि ईसाई परिवारों का कहना है कि धर्म बदलने से उनकी नागरिकता या गांव का हक खत्म नहीं हो जाता।
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इससे पहले बस्तर के चिंदवाड़ा गांव का मामला भी काफी सुर्खियों में रहा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय बंटी हुई थी और अंततः शव को गांव से बाहर दफनाना पड़ा था। अब इस नई याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट इस जटिल सामाजिक और धार्मिक गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करेगा। अदालत के इस हस्तक्षेप से उम्मीद जगी है कि भविष्य में अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील विषय पर टकराव कम होगा।