44 साल पुराने 20 लाख के कथित घोटाले में पूर्व निदेशकों को राहत, बिलासपुर हाईकोर्ट ने खारिज की CBI की अपील

Bilaspur High Court: जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने एसएस संधू और डीएस संधू को बरी किए जाने के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की अपील खारिज कर दी।
Bilaspur high court news,
बिलासपुर हाईकोर्ट(सोर्स: सोशल मीडिया)
Published on: 
Updated on: 

Highlights

  • दो पूर्व निदेशकों को हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत।

  • केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की अपील खारिज।

  • 1986 में सीबीआई ने दर्ज किया था एफआईआर।

Bilaspur High Court Dismisses CBI Appeal: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एनटीपीसी कोरबा में बिना सामान की आपूर्ति किए करीब 20 लाख रुपये का भुगतान लेने के कथित मामले में अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के दो पूर्व निदेशकों को बड़ी राहत दी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने एसएस संधू और डीएस संधू को बरी किए जाने के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

Bilaspur high court news,
13 साल अलग रहने के बाद भी नहीं मिला तलाक! बिलासपुर हाईकोर्ट ने पति की अपील की खारिज, जानिए वजह

क्या है 20 लाख रुपये के कथित घोटाले का मामला?

मामला वर्ष 1981-82 का है। अभियोजन के मुताबिक, अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को एनटीपीसी के कोरबा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के तीसरे चरण में वेंटिलेशन सिस्टम और एयर कंडीशनिंग संयंत्र की आपूर्ति एवं स्थापना का ठेका मिला था। इसके लिए 24 अप्रैल 1981 से उपकरणों की आपूर्ति शुरू हुई और भुगतान के लिए 17 नवंबर 1981 को लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किया गया।

Bilaspur high court news,
चमत्कार! जब 101 फीट के रावण के सामने रायपुर में थम जाती है कई ट्रेनों की रफ्तार

सीबीआई को आरोप मिले थे कि जनवरी से नवंबर 1982 के बीच कंपनी के निदेशकों और एनटीपीसी के कुछ अधिकारियों ने कथित मिलीभगत से बिना सामान की आपूर्ति किए करीब 20 लाख रुपये का भुगतान करा लिया। आरोप था कि इसके लिए फर्जी बिल और वाउचर का इस्तेमाल किया गया, जिससे एनटीपीसी को आर्थिक नुकसान हुआ।

1986 में FIR, पहले सजा फिर बरी

सीबीआई ने वर्ष 1986 में इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच के बाद आरोप पत्र पेश किया। विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट, सीबीआई, रायपुर ने 10 जनवरी 2018 को एसएस संधू, डीएस संधू सहित आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया था।

हालांकि, आरोपियों ने इस फैसले को चुनौती दी। इसके बाद विशेष न्यायाधीश, सीबीआई मामलों की विशेष अदालत, रायपुर ने 13 सितंबर 2019 को दोषसिद्धि का फैसला पलटते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर से सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान तीन अन्य आरोपियों की मृत्यु हो गई।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

आरोपियों की ओर से कहा गया कि एनटीपीसी के अधिकारियों के साथ बैठक के बाद भुगतान में सामने आई विसंगतियों का समाधान कर लिया गया था। बचाव पक्ष के मुताबिक, कथित अतिरिक्त भुगतान की राशि वापस कर दी गई और बाद में संबंधित सामान की आपूर्ति भी कर दी गई।

आरोपियों ने फर्जी बिल जारी करने और धोखाधड़ी करने के आरोपों से इनकार किया। उनका तर्क था कि सामान की आपूर्ति से पहले और गंतव्य पर पहुंचने के बाद एनटीपीसी के अधिकारी उसका सत्यापन करते थे। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि कंपनी ने सिंगरौली स्थित एनटीपीसी का करीब 1.40 करोड़ रुपये का ठेका भी बिना किसी शिकायत के पूरा किया था।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की CBI की अपील?

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए आरोपियों के बीच किसी गैरकानूनी काम को अंजाम देने के समझौते का विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है। इस मामले में अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे आरोपियों के बीच आपराधिक साजिश साबित हो सके।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि लेन-देन में कथित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एनटीपीसी के अधिकारियों को आरोपी नहीं बनाया गया था। अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सीबीआई की अपील खारिज कर दी और दोनों पूर्व निदेशकों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।

Navbharat Live
navbharatlive.com