Michael Burry की चेतावनी: वेनेजुएला पर US एक्शन को हल्के में ले रहा है बाजार, बड़े संकट का संकेत है?
Venezuela Oil Shock: 2008 की मंदी की सटीक भविष्यवाणी करने वाले माइकल बरी ने वेनेजुएला संकट पर दुनिया को आगाह किया है। जानें क्यों अमेरिकी तेल वर्चस्व चीन और रूस के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
Michael Burry Venezuela US Action Market Impact: साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की पहले ही भविष्यवाणी करने वाले माइकल बरी के अनुसार, वेनेजुएला पर अमेरिका की हालिया कार्रवाई को शेयर बाजार बेहद हल्के में ले रहे हैं। बरी कहते हैं कि निवेशक तुरंत असर देखने के आदी होते हैं, लेकिन इस “जम्हाई लेते बाजार” के पीछे एक गहरा संकट छिपा है।
उनके मुताबिक, यह केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल पावर, तेल बाजार और जियोपॉलिटिक्स में एक ऐसा बड़ा बदलाव है जिसका असर मध्य और दीर्घकालिक (mid and long term) में दिखेगा।
My thoughts on potential impacts short medium and long term of the events in Venezuela this weekend.This is a paradigm shift despite the markets yawning.
वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाला देश है, लेकिन सालों के प्रतिबंधों ने इसके उत्पादन को कमजोर कर दिया था। अब अमेरिका द्वारा वहां सीधा नियंत्रण स्थापित करना यह दर्शाता है कि वाशिंगटन ऊर्जा संसाधनों को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि ‘फिलहाल वेनेजुएला को अमेरिका चलाएगा’ और मदुरो की गिरफ्तारी इस पावर मूव को पूरी तरह स्पष्ट करती है।
चीन और रूस के लिए खतरे के संकेत
माइकल बरी का मानना है कि यह घटनाक्रम चीन के लिए एक सीधी चेतावनी है। चीन ने पिछले डेढ़ दशक में वेनेजुएला के तेल उत्पादन की उम्मीद में वहां भारी निवेश किया था, जो अब अमेरिकी प्रभाव में आ गया है। इसी तरह, अगर वेनेजुएला का तेल अमेरिकी निगरानी में वैश्विक बाजार में लौटता है, तो रूस की ऊर्जा-आधारित पकड़ भी कमजोर हो जाएगी। बरी के अनुसार, अमेरिका ने कुछ ही पलों में वह कर दिखाया जिसे रूस सालों में नहीं कर पाया।
जहां एक ओर वेनेजुएला का IBC इंडेक्स दो दिनों में 90% की छलांग लगा चुका है, वहीं अमेरिकी ऑयल-सर्विस कंपनियां जैसे Halliburton और Baker Hughes को इस जीर्ण-शीर्ण तेल क्षेत्र को दोबारा खड़ा करने का सीधा फायदा मिल सकता है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि वैश्विक सप्लाई बढ़ने से कच्चे तेल के दाम 50 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकते हैं, जिससे आयात बिल कम होगा। हालांकि, अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान भारत को अपने कूटनीतिक संतुलन पर पैनी नजर रखनी होगी।
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