सांकेतिक तसेवीर (AI)
Global Food Crisis: पश्चिम एशिया में इस समय जो तनाव बना हुआ है, वह अब सिर्फ सीमाओं के विवाद तक सीमित नहीं रहा है। यह तेजी से एक ऐसे वैश्विक खाद्य संकट का रूप ले रहा है, जिसकी आंच जल्द ही आपकी रसोई तक पहुंच सकती है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के अनुसार, अगर यह संघर्ष जून तक इसी तरह जारी रहता है, तो दुनिया भर में 4.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गंभीर भुखमरी का सामना कर सकते हैं। यह आंकड़ा मौजूदा 31.9 करोड़ के पहले से ही चिंताजनक स्तर को और आगे ले जाएगा।
इस पूरे संकट का केंद्र होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी-इजराइली हमलों के बाद से ही यहां मानवीय सहायता और व्यापारिक आपूर्ति बाधित हो गई है। दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान की ओर से इस मार्ग को लगभग ‘बंद’ करने के संकेतों के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। सुरक्षा कारणों से जहाजों को वैकल्पिक और लंबे मार्गों से भेजा जा रहा है, जिससे माल ढुलाई लागत में लगभग 18% की बढ़ोतरी हुई है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर खेती-किसानी पर भी पड़ता है- ट्रैक्टर चलाने, सिंचाई और अनाज को मंडियों तक पहुंचाने की लागत बढ़ जाती है।
Moneycontrol की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष में भले ही ध्यान तेल की कीमतों पर हो, लेकिन खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा और छिपा हुआ खतरा उर्वरक (फर्टिलाइजर) का संकट है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले यूरिया का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी देशों से होकर होर्मुज के रास्ते ही वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। अकेले कतर दुनिया के कुल यूरिया उत्पादन में करीब 14% योगदान देता है।
लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण कतर ने अपने बड़े यूरिया संयंत्रों में उत्पादन रोक दिया है। गैस की इसी कमी की वजह से भारत को भी कई यूरिया प्लांट्स में उत्पादन घटाना पड़ा है, क्योंकि यहां गैस उपलब्धता लगभग 70% तक गिर गई है। पड़ोसी देश बांग्लादेश में तो गैस राशनिंग के चलते कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। नतीजतन, मध्य पूर्व से यूरिया निर्यात की कीमतें हाल के हफ्तों में लगभग 40% बढ़ गई हैं और पिछले साल की तुलना में करीब 60% अधिक हो चुकी हैं।
यह संकट दुनिया के लिए बेहद गलत समय पर आया है। उत्तरी गोलार्ध में इस समय मुख्य बुवाई का सीजन चल रहा है (मध्य फरवरी से मई की शुरुआत तक)। अच्छी पैदावार के लिए किसानों को इस अवधि में सबसे अधिक खाद की जरूरत होती है। यदि खाद महंगी हो जाए या उपलब्ध ही न रहे, तो किसान इसका उपयोग कम कर देंगे। इसका सीधा असर चावल, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार पर पड़ेगा।
भारत, जो अपनी 40% से अधिक उर्वरक जरूरत मध्य पूर्व से पूरा करता है, चावल और गेहूं का बड़ा निर्यातक है। वहीं ब्राजील अपने सोयाबीन उत्पादन के लिए लगभग पूरी तरह आयातित उर्वरकों पर निर्भर है। ऐसे देशों की कृषि उपज में थोड़ी भी गिरावट वैश्विक खाद्य बाजार को प्रभावित कर सकती है।
खेती की बढ़ती लागत और घटते उत्पादन का अंतिम असर सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ता है। जब गेहूं और चावल की आपूर्ति घटेगी, तो बाजार में कमी होगी और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा, जो आगे चलकर महंगाई के रूप में सामने आ सकता है।
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रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पहले से ही वैश्विक खाद्य आपूर्ति दबाव में थी, और अब यह नया संकट उस कमजोर व्यवस्था को और अस्थिर करने की ओर बढ़ रहा है।