केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, (सोर्स- सोशल मीडिया)
India’s Fiscal Deficit: भारत का राजकोषीय घाटा चालू वर्ष 26 की शुरुआत से फरवरी के अंत तक 12.52 लाख करोड़ रुपये रहा है, जो कि पूरे वित्त वर्ष के लक्ष्य 15.58 लाख करोड़ रुपये का 80.5 प्रतिशत है। वित्त मंत्रालय की ओर से यह जानकारी दी गई है। मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों में बताया गया कि भारत सरकार को फरवरी 2026 तक 27,91,943 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं, जो कि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित संशोधित अनुमान 82 प्रतिशत है।
इसमें 21,45,223 करोड़ रुपये टैक्स रेवेन्यू (केंद्र को प्राप्त शुद्ध राशि), 5,81,173 करोड़ रुपये गैर-कर राजस्व और 65,547 करोड़ रुपये की गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां शामिल हैं। इस अवधि के दौरान भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों को करों के हिस्से के हस्तांतरण के रूप में 12,66,369 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 85,837 करोड़ रुपये अधिक है।
इस अवधि के दौरान भारत सरकार द्वारा किया गया कुल खर्च 40,44,592 करोड़ रुपये रहा है, जो कि वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित कुल व्यय अनुमान का 81.5 प्रतिशत है, जिसमें से 31,15,270 करोड़ रुपये राजस्व मद पर और 9,29,322 करोड़ रुपये पूंजी मद पर व्यय किए गए है। कुल राजस्व व्यय में से 10,65,305 करोड़ रुपये ब्याज भुगतान के मद पर और 3,89,610 करोड़ रुपये प्रमुख सब्सिडी के मद पर व्यय किए गए हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.3 प्रतिशत तक और कम करने का अनुमान लगाया है। 1 फरवरी को अपने बजट भाषण में उन्होंने कहा कि सरकार ने 2025-26 के बजट में राजकोषीय घाटे को 4.4 प्रतिशत तक कम करने की अपनी प्रतिबद्धता पूरी कर ली है और अब राजकोषीय विवेक के पथ पर अग्रसर रहते हुए इसे और कम करके 4.3 प्रतिशत तक लाएगी।
निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह लक्ष्य आर्थिक गति को बनाए रखने और सार्वजनिक वित्त को स्थिर रखने के बीच संतुलन को दर्शाता है। राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और कुल राजस्व के बीच का अंतर होता है।
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जब सरकार की कुल कमाई (Tax और अन्य स्रोतों से) उसके कुल खर्च से कम होती है, तो उस अंतर को भरने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ता है। इसी कमी या अंतर को ‘राजकोषीय घाटा’ कहा जाता है। इसे एक उदाहरण से समझें- अगर सरकार की कमाई 100 रुपये है और वह 120 रुपये खर्च कर रही है, तो 20 रुपये का यह अंतर राजकोषीय घाटा है। सरकार इस घाटे को पूरा करने के लिए आमतौर पर केंद्रीय बैंक (RBI) या बाजार से कर्ज लेती है।