सांकेतिक एआई फोटो
Hormuz Blockade India Inflation Impact: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा होर्मुज में नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा ने पूरी दुनिया में आर्थिक और कूटनीतिक हलचल पैदा कर दी है। चूंकि यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है इसलिए इस कदम का सीधा और तात्कालिक असर वैश्विक बाजारों पर देखने को मिल रहा है। एशियाई शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है और निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
जैसे ही सप्लाई रूट पर खतरे की खबर फैली, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया और यह $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। विशेषज्ञों का अंदेशा है कि यदि तनाव कम नहीं हुआ तो ये कीमतें और भी ऊंचाई छू सकती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल से लेकर माल ढुलाई और रोजमर्रा की सभी आवश्यक वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
बैंकिंग और बाजार विशेषज्ञ अजय बग्गा ने चेतावनी दी है कि यदि कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह विफल हो जाती है और नाकेबंदी प्रभावी रूप से लागू रहती है तो होर्मुज का रास्ता लगभग बंद हो जाएगा। इससे तेल की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) टूट जाएगी और बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखा जाएगा। हालांकि बड़े निवेशक इस स्थिति में मुनाफा कमा सकते हैं लेकिन आम जनता के लिए यह समय आर्थिक रूप से काफी जोखिम भरा हो सकता है।
भारत के लिए यह संकट अधिक गंभीर साबित हो सकता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर है। तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ेगा जिससे सरकार के वित्तीय घाटे पर दबाव पड़ेगा।
इसके अलावा, भारत के बाहरी व्यापार (External Trade) पर भी बुरा असर दिखना शुरू हो गया है जिससे देश के करीब 20% निर्यात (Exports) के प्रभावित होने की खबर है। शिपिंग रूट्स में बाधा आने से लाल सागर और ओमान की खाड़ी के रास्ते व्यापार करना मुश्किल हो गया है।
इस भू-राजनीतिक तनाव का सबसे दुखद पहलू खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी देशों में निर्माण और गिग सेक्टर में काम के अवसर घटने की वजह से लगभग 9 लाख भारतीय नौकरी छोड़कर वापस लौट चुके हैं।
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इससे विदेश से आने वाले पैसे (Remittances) में बड़ी कमी आने की आशंका है, जिसका सीधा असर केरल जैसे उन राज्यों पर पड़ेगा जो इन प्रेषणों पर निर्भर हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है और महंगाई एक स्थायी समस्या बन सकती है।