

Indian Share Market in Modi 3.0: भारतीय अर्थव्यवस्था की 8% की तेज ग्रोथ के बावजूद शेयर बाजार मंदी के दलदल में फंसता जा रहा है। दोनों मुख्य शेयर बेंचमार्क बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी विगत 28 महीनों के न्यूनतम स्तरों पर आ गए हैं। भारतीय मुद्रा लगातार कमजोर हो रही है। 'मोदी 3.0' के कार्यकाल में शेयर बाजार के 13 करोड़ से अधिक निवेशकों को फायदा कम और नुकसान ही अधिक हुआ है।
3 जून 2024 को लोकसभा चुनाव के नतीजों की पूर्व संध्या पर सेंसेक्स 76,469 अंक पर पर था और मोदी सरकार बनने के बाद बढ़ता हुआ 26 सितंबर 2024 को 86,978 अंक की नई ऊंचाई पहुंचा था, लेकिन उसके बाद से लगातार मंदी आ रही है और अब सेंसेक्स 71,272 अंक का निचला स्तर छू चुका है।
सेंसेक्स में पिछले दो साल में 17% की भारी गिरावट आई है। इस दौरान डॉलर की कीमत 84 से बढ़ते हुए 97 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई। हालांकि, इस सप्ताह यह वापस 95 के स्तर पर आ गई। दो साल में रुपया भी 15% कमजोर हुआ है। यानी मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में अब तक शेयर बाजार भारी मंदी से त्रस्त रहा है और देश के करोड़ों निवेशक भारी घाटे में आ रहे हैं, क्योंकि बाजार में लिस्टेड अधिकांश कंपनियों के शेयर 25 से लेकर 50-60% तक नुकसान में आ गए हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि देश की जीडीपी में 8% की तेज ग्रोथ हो रही है, फिर भी शेयर बाजार में घोर मंदी के हालात हैं। यह विचित्र स्थिति पहली बार है और इसका सबसे बड़ा कारण है मोदी सरकार द्वारा निवेशकों पर लगातार बढ़ाया जा रहा टैक्स बोझ।
इस टैक्स बोझ के कारण ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) में 'भारत छोड़ो' की रेस लग गई है। इस साल अब तक FII ने 3.20 ट्रिलियन रुपये यानी 33 बिलियन डॉलर की रिकॉर्ड बिकवाली की है। यह विदेशी निवेशकों की किसी एक साल में भारत से अब तक की सबसे बड़ी पूंजी निकासी है।
हालांकि, बाजार में आ रही घोर मंदी के पीछे कई विश्लेषक ईरान-अमेरिका युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में भारी तेजी और अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल जैसे निगेटिव फैक्टर बता रहे हैं, लेकिन जब जनवरी- फरवरी 2026 में इनमें से तीनों ही फैक्टर नहीं थे और दुनिया के सारे बाजार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहे थे, तब भी भारतीय बाजार में मंदी आ रही थी। इसलिए सबसे बड़ा निगेटिव फैक्टर भारी टैक्स बोझ है। तभी भारत में विगत 24 महीनों से लगातार मंदी आ रही है।
मोदी सरकार ने शेयर बाजार के निवेशकों पर 3 तरह के टैक्स लगा दिए हैं और इनमें लगातार बढ़ोतरी भी की है। पहला टैक्स शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) है, जो 20% कर दिया गया है। दूसरा टैक्स लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) है, जो 12.50% कर दिया गया है। जबकि मनमोहन सरकार के समय एलटीसीजी नहीं था। इसे मोदी सरकार ने थोपा है। तीसरा टैक्स है सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), जो शेयरों की खरीद-बिक्री पर तुरंत देना पड़ता है।
LTCG या STCG तो फिर भी शेयर फायदे में बेचने पर लागू होता है, लेकिन STT तो घाटे में शेयर बेचने पर भी लगता है। आप अपने शेयर लाभ में बेच रहे हैं या नुकसान में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को इससे मतलब नहीं, आपको नुकसान में बेचने पर भी STT देना होगा। ऐसी 'जिद' के कारण ही बाजार में मंदी गहराती जा रही है।
मोदी सरकार के इस अड़ियल रवैये और भारी टैक्स बोझ के कारण ही भारत से विदेशी निवेशक भाग रहे हैं और अपना पैसा निकाल कर विदेशी बाजारों में लगा रहे हैं। पिछले दो साल में अमेरिकी शेयर बाजार के मुख्य बेंचमार्क डाउ जोन्स में 35% की जोरदार तेजी आई है। अन्य बड़े वैश्विक बाजारों में भी ऐसी ही तेजी है। इसके विपरीत सेंसेक्स और निफ्टी में 17% की भारी मंदी आई है।
अगर अमेरिकी बाजार से तुलना करें तो भारतीय बाजार 47% (35+17) के भारी नुकसान में है। और यदि रुपये-डॉलर विनिमय दर में 15% की गिरावट भी जोड़ दी जाए तो कुल नुकसान (अंडर परफॉर्मेंस) 62% (35+17+15) हो जाएगा। इससे पहले हमेशा अमेरिकी बाजारों के संग-संग ही भारत में तेजी या मंदी आती थी। यह पहली बार है कि विदेशों में तेजी है और भारत में मंदी।
विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी का असर केवल शेयर बाजार में ही नहीं पड़ता है, बल्कि इससे देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ते हैं। रुपया कमजोर होता है तो सभी आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। देश का विदेश व्यापार घाटा बढ़ता है। आयात महंगा होने से तेल-गैस, खाद्य तेल, यूरिया सहित सभी कमोडिटी महंगी होने लगती है और पूरे देश में महंगाई बेकाबू होने लगती है। जैसा कि मौजूदा समय में हो रहा है।
यहीं नहीं, देश से विदेशी पूंजी निकासी और शेयर बाजार में मंदी आने से उद्योग जगत में निराशा का माहौल व्याप्त हो जाता है और तब देश की अर्थव्यवस्था पर मंदी का खतरा मंडराने लगता है। इसी खतरे को देखते हुए शेयर बाजार के तमाम निवेशक और विशेषज्ञ लगातार एलटीसीजी हटाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अपनी 'जिद' पर अड़े हुए हैं।
जब भारत में विदेशी निवेशकों को कोई छूट या आकर्षण नहीं दिखेगा तो वे यहां क्यों निवेश करेंगे। छूट की बात तो दूर ऊपर से टैक्स बोझ बढ़ा दिया गया है। आम निवेशकों के हितों के लिए बनाए गए नियामक 'सेबी' के अध्यक्ष तुहिन कांत पांडे भी देश के करोड़ों निवेशकों को हो रहे नुकसान पर मौन साधे हुए हैं।
हैरानी की बात यह भी है कि अन्य मुद्दों पर खूब आंदोलन करने वाले विपक्षी दल भी आम निवेशकों के हित में कोई आवाज नहीं उठा रहे हैं।