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Bihar Politics: बिहार की राजनीति में एक बड़े दौर के खत्म होने के संकेत मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सीएम पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया है। उनके इस अचानक निर्णय के बाद राज्य की सियासत में कई सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में भी “ऑपरेशन लोटस” जैसी राजनीतिक रणनीति बनाई गई है?
दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू-भाजपा और एनडीए की ओर से “25 से 30, फिर से नीतीश” का नारा दिया गया था। पटना से लेकर कई जिलों में नीतीश कुमार की तस्वीर वाले पोस्टर लगाए गए थे, जिनमें दावा किया गया था कि 2025 से 2030 तक वही बिहार के मुख्यमंत्री रहेंगे।
लेकिन बिहार की राजनीति में कब क्या हो जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। विधानसभा में भारी बहुमत से जीत के बाद नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि महज चार महीने के भीतर ही वह इस पद से हटने का फैसला कर लेंगे। अब वह मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा की ओर जा रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। उनके मुताबिक, इसके लिए पहले से ही माहौल तैयार किया जा रहा था। जब परिस्थितियां जेडीयू के अनुकूल नहीं थीं, तब तक नीतीश कुमार को नेतृत्व में बनाए रखा गया। अब जब स्थिति स्थिर दिखाई दे रही है, तो पहले से तय योजना को लागू किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति कई महीनों पहले ही तय कर ली गई थी और सही समय का इंतजार किया जा रहा था।
कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्री पद में बदलाव का फैसला होली के आसपास लागू करने की रणनीति बनाई गई, ताकि चुनाव में एनडीए को मिली जीत और उसके नेतृत्व की लोकप्रियता पर कोई असर न पड़े। फिलहाल जेडीयू और भाजपा के बीच अगले मुख्यमंत्री को लेकर सहमति बनने की बात कही जा रही है। जेडीयू की शर्त बताई जा रही है कि नया मुख्यमंत्री वही होगा जिस पर दोनों दल सहमत हों और जिस पर नीतीश कुमार की भी सहमति हो।
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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले समय में जेडीयू की रणनीति और रुख में बदलाव देखने को मिल सकता है और यह कदम लंबे समय से चल रही योजना का हिस्सा हो सकता है। वहीं विपक्ष के साथ-साथ जेडीयू के कुछ कार्यकर्ता भी इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि सोची-समझी रणनीति के तहत नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा रहा है। हालांकि पार्टी कार्यकर्ता खुलकर कुछ नहीं कह रहे, लेकिन अंदरखाने यह चर्चा है कि इसके पीछे सहयोगी दलों और पार्टी के कुछ नेताओं की भूमिका हो सकती है। ऐसे में बिहार की राजनीति में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या राज्य में भी “ऑपरेशन लोटस” की कहानी दोहराई जा रही है।