नीतीश-लालू के बाद बिहार की राजनीति, (डिजाइन फोटो/ नवभारत लाइव)
Bihar Politics After Nitish Kumar And Lalu Yadav: बिहार की राजनीति में पिछले तीन दशकों से चला आ रहा ‘लालू-नीतीश’ युग अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की घोषणा ने उस राजनीतिक अध्याय पर विराम लगा दिया है, जिसने मंडल आयोग के बाद से राज्य की दिशा तय की थी। लालू प्रसाद यादव की स्वास्थ्य संबंधी कारणों से सीमित सक्रियता और नीतीश कुमार के केंद्र की राजनीति में रुख करने के बाद, बिहार की सत्ता की धुरी अब तेजस्वी यादव, सम्राट चौधरी और चिराग पासवान जैसे युवा चेहरों के इर्द-गिर्द सिमट गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव केवल चेहरों का नहीं, बल्कि मुद्दों का भी है, जहां पुरानी पीढ़ी के ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सुशासन’ के दावों के बीच अब नई पीढ़ी ‘रोजगार’ और ‘आधुनिक विकास’ के नए वादों के साथ जनता के बीच है। 14 अप्रैल के बाद बिहार में होने वाला सत्ता परिवर्तन इस नए युग की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है।
1990 में लालू प्रसाद यादव के उदय ने बिहार को ‘सामाजिक न्याय’ का एक नया नारा दिया। पिछड़ों और दलितों की आवाज बनकर उभरे लालू ने राज्य की सदियों पुरानी दबंगई वाली राजनीति को चुनौती दी। इसके बाद 2005 में नीतीश कुमार ने ‘सुशासन’ और ‘विकास’ के नाम पर सत्ता संभाली। इन 30 सालों में बिहार ने सड़क, बिजली और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बड़े बदलाव देखे। हालांकि, यह दौर जातिगत समीकरणों के अटूट बंधनों से भी भरा रहा। ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ की इस जोड़ी ने बिहार को एक ऐसी राजनीति दी, जहां विचारधाराएं बदलती रहीं लेकिन चेहरे वही रहे।
10 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार का दिल्ली में राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेना महज एक पद का परिवर्तन नहीं है। यह बिहार की सत्ता से उनके ‘ग्रेसफुल एग्जिट’ की शुरुआत है। 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से उनके संभावित इस्तीफे के साथ ही जेडीयू के भीतर और एनडीए गठबंधन में नेतृत्व की नई लकीर खींची जाएगी। नीतीश का केंद्र की राजनीति में जाना यह संकेत है कि अब वे राज्य की ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ वाली राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका देख रहे हैं।
अब सवाल यह है कि लालू और नीतीश की विरासत को आगे कौन बढ़ाएगा? बिहार के मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर डालें तो, फिलहाल मैदान में तीन मुख्य खिलाड़ी हैं। लालू यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में तेजस्वी ने खुद को एक परिपक्व नेता साबित किया है। 2020 के विधानसभा चुनाव और हालिया रैलियों में उन्होंने ‘जाति’ के साथ ‘नौकरी’ के मुद्दे को जोड़कर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वे अब केवल यादव-मुस्लिम समीकरण के नेता नहीं, बल्कि ‘A to Z’ की राजनीति करने का दावा कर रहे हैं।
भाजपा ने बिहार में नीतीश के विकल्प के रूप में सम्राट चौधरी को मजबूती से पेश किया है। कोइरी समाज से आने वाले सम्राट अपनी आक्रामक शैली और भाजपा के मजबूत कैडर के दम पर खुद को अगले मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार के रूप में देख रहे हैं। कई मौके पर खुद नीतीश कुमार भी इस बात का संकेत दे चुके हैं कि अब यहीं (सम्राट चौधरी ही सबकुछ देंखेंगे।
रामविलास पासवान की विरासत को संभाल रहे चिराग पासवान ने खुद को ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के विजन के साथ युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाया है। वे किंगमेकर की भूमिका से निकलकर अब मुख्य भूमिका की तलाश में हैं। हाल में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने चिराग पासवान और उनकी पार्टी के मनोबल को और भी बढ़ा दिया है। बिहार के युवा वर्ग में चिराग पासवान की एक छवि है। राज्य का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि चिराग बिहार का नेतृत्व करें।
पुरानी पीढ़ी की राजनीति ‘पहचान’ पर आधारित थी, लेकिन नई पीढ़ी के सामने अपेक्षाओं का पहाड़ है। बिहार का युवा अब केवल अपनी जाति का मुख्यमंत्री नहीं चाहता, वह रोजगार, आईटी पार्क, बेहतर शिक्षा और पलायन से मुक्ति चाहता है। नीतीश-लालू युग ने बिहार को एक आधार तैयार करके दिया है, लेकिन उस पर भव्य इमारत बनाने की जिम्मेदारी अब इन युवा चेहरों की है।
यह भी पढ़ें: दिल्ली नहीं…पटना ही पहली पसंद! मोदी कैबिनेट में शामिल नहीं होंगे नीतीश कुमार; जानें इसके पीछे की असली रणनीति
2026 का यह ‘जेनरेशन शिफ्ट’ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि बिहार के लिए एक नई परीक्षा की शुरुआत है। आने वाले कुछ महीनों में होने वाले सत्ता परिवर्तन के बाद यह साफ हो जाएगा कि क्या नई पीढ़ी पुराने दिग्गजों के साये से बाहर निकलकर बिहार को विकास की नई ऊंचाई पर ले जा पाएगी या फिर सियासत फिर उन्हीं पुराने जातिगत समीकरणों के भंवर में फंसी रहेगी।