सियासत-ए-बिहार: जब कांग्रेस को कुर्सी से हटाने के लिए 7 पार्टियों ने किया गठबंधन, 5 साल में बनीं 9 सरकारें
साल 2000 से बिहार में अकेले के दम पर कोई भी पार्टी बहुमत नहीं हासिल कर सकी है। लेकिन क्या आपको यह पता है कि बिहार में पहली बार कब गठबंधन हुआ था? सूबे में गठबंधन का इतिहास क्या है?
- Written By: अभिषेक सिंह
सांकेतिक तस्वीर (डिजाइन)
पटना: बिहार में विधानसभा इंतखाब की आमद की आहट सुनाई देने लगी है। सियासी सूरमा एक दूसरे को पटखनी देने के लिए समीकरण सेट करने में जुट गए हैं। एक तरफ नीतीश कुमार की अगुवाई में NDA अपनी कुर्सी बचाने के लिए जद्दोजेहद में जुटा हुआ है तो दूसरी तरफ तेजस्वी यादव के नेतृत्व में ‘महागठबंधन’ सरकार बनाने का सपना संजो रहा है।
बिहार में साल 2000 से अब तक लगातार गठबंधन की सरकार बनती आई है। यहां अकेले के दम पर कोई भी पार्टी बहुमत नहीं हासिल कर सकी है। लेकिन क्या आपको यह पता है कि बिहार में पहली बार कब गठबंधन हुआ था? सूबे में गठबंधन का इतिहास क्या है? अगर नहीं तो ‘सियासत-ए-बिहार’ की इस कड़ी में आपको सबकुछ पता चल जाएगा।
पहली बार कब हुआ गठबंधन?
वर्ष 1967 में बिहार और झारखंड दोनों एक राज्य हुआ करते थे और विधानसभा में कुल 312 सीटें थीं। उस वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 128, एसएसपी को 63, बीजेएस को 26, सीपीआई को 24, पीएससी को 18, जेकेडी को 13, सीपीएम को 04, एसडब्ल्यूयूएच को 03 और निर्दलीयों को 33 सीटें मिली थीं।
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पहली बार सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस
ऐसी स्थिति में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए 7 विपक्षी दल एक साथ आए और उन्हें निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी मिला। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस पहली बार सत्ता से बेदखल हुई और गठबंधन सरकार बनी। हालांकि, यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी।
5 साल में बनीं 9 सरकारें
1967 में जब बिहार में पहली बार गठबंधन सरकार बनी तो महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी और अंदरूनी कलह के कारण गिर गई। इसके बाद दो और सरकारें बनीं लेकिन वे भी ज़्यादा दिन नहीं चल सकीं। इन सबके बीच, महज़ दो साल बाद यानी 1969 में विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हुए।
सांकेतिक तस्वीर (सोर्स- सोशल मीडिया)
इस चुनाव में कांग्रेस 118 सीटों पर सिमट गई। जिसके बाद 16 फरवरी 1970 को इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने सीपीआई, डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी, शोषित दल, डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पार्टी जैसी पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाई। हालांकि, यह सरकार भी अपनी पिछली सरकारों की तरह ही निकली और दिसंबर 1970 में गिर गई।
1972 में कांग्रेस को मिला बहुमत
इसके बाद कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में सरकार बनी। जनसंघ, संगठन कांग्रेस, लोकतांत्रिक कांग्रेस, शोषित दल, भारतीय क्रांति दल जैसी पार्टियों ने गैर-कांग्रेसी संयुक्त विधायक दल का समर्थन किया। इसके बाद 1972 में हुए चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और सरकार 1977 तक आराम से चलती रही। हालांकि, इस दौरान मुख्यमंत्री बदलते रहे।
1977 में तीसरी बार हुआ गठबंधन
इसके बाद गठबंधन का दूसरा बड़ा प्रयोग साल 1977 में देखने को मिला। उस दौरान देश में आपातकाल लगने के कारण कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से हाथ धोना पड़ा और बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। इस चुनाव में जनता पार्टी को 214, कांग्रेस को 57, सीपीआई को 21, सीपीएम को 04, जेकेडी को 02 और निर्दलीयों को 24 सीटें मिलीं।
…और फिर गिर गई सरकार
आपको बता दें कि 1977 के चुनाव में जो जनता पार्टी बनी थी, उसमें कांग्रेस विरोधी जनसंघ, लोकदल समेत कई दल शामिल थे। इस सरकार के मुखिया के तौर पर कर्पूरी ठाकुर को चुना गया था। हालांकि, इस सरकार का भी हश्र पहली गैर-कांग्रेसी सरकार जैसा ही हुआ और आपसी षडयंत्रों और मतभेदों के कारण यह सरकार गिर गई।
10 साल तक कांग्रेस ने किया राज
इसके ठीक ढाई साल बाद 1980 में देश में मध्यावधि चुनाव हुए। कांग्रेस केंद्र में दोबारा सत्ता में आई। आते ही बिहार सरकार बर्खास्त हो गई। इसी साल यहां भी विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार बनी और 1990 तक कांग्रेस ने बिहार में राज किया।
सांकेतिक तस्वीर (सोर्स- सोशल मीडिया)
1990 के दशक की शुरुआत बिहार में गठबंधन सरकार से हुई। इस समय तक कांग्रेस की हालत कमजोर हो चुकी थी। विपक्ष में भी नए युवा तुर्क अपनी राजनीतिक पहचान बना चुके थे। उम्रदराज नेताओं को किनारे किया जा रहा था। इसी माहौल में 1990 के विधानसभा चुनाव हुए।
बीजेपी के समर्थन से लालू बने सीएम
इस चुनाव में जनता दल 122 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस सिर्फ 71 सीटों पर सिमट गई। भाजपा को 39, सीपीआई को 23, सीपीएम को 06, जेएमएम को 19, जेएमपी को 03 और निर्दलीयों को 30 सीटें मिलीं। इस चुनाव में भी किसी भी पार्टी को सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला।
ऐसे में भाजपा और जेएमएम ने लालू के नाम का समर्थन किया और लालू प्रसाद यादव पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। हालांकि लालू और भाजपा की दोस्ती ज्यादा दिनों तक नहीं चली। अयोध्या रथ यात्रा रोकने के कारण भाजपा ने लालू सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।
लालू के सपोर्ट में खड़े हुए नामधारी सिंह
लेकिन बिहार भाजपा के तत्कालीन बड़े नेता इंदर सिंह नामधारी लालू के समर्थन में आ गए और भाजपा में फूट पड़ गई। नामधारी का गुट लालू प्रसाद यादव के समर्थन में आ गया और इस तरह लालू ने अपनी कुर्सी बचा ली और कई दलों के समर्थन से चलने वाली इस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया।
2000 से चल रही गठबंधन सरकार
वहीं, साल 2000 से लेकर अब तक यहां लगातार गठबंधन की ही सरकार बनती आ रही है। 2000 में राबड़ी आरजेडी ने लेफ्ट के साथ मिलकर सरकार बनाई। इसके बाद 2005 में एनडीए की सरकार बनी। 2010 में भी एनडीए ने सरकार बनाई। 2015 में लालू-नीतीश साथ आए महागठबंधन की सरकार बनी। इसके बाद 2020 में फिर से नीतीश ने NDA के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और सरकार बनाई।
