ADAS System (Source. Freepik)
Smart Cars India: पिछले 10-20 वर्षों में ऑटो इंडस्ट्री ने तकनीक के दम पर जबरदस्त बदलाव देखा है। आज कार सिर्फ एक साधारण वाहन नहीं रही, बल्कि एक स्मार्ट और सेफ मशीन बन चुकी है। पहले जहां सुरक्षा मजबूत बॉडी और एयरबैग तक सीमित थी, वहीं अब एडवांस टेक्नोलॉजी इस जिम्मेदारी को संभाल रही है। इसी कड़ी में Advanced Driver Assistance Systems यानी ADAS टेक्नोलॉजी तेजी से लोकप्रिय हो रही है, जो ड्राइविंग को आसान और सुरक्षित बना रही है।
ADAS (एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम) एक ऐसी तकनीक है, जो ड्राइवर की मदद करके सड़क हादसों की संभावना को कम करती है। भारत में अब कई कारों में लेवल-2 ADAS मिलने लगा है, जिससे खासकर हाईवे और भारी ट्रैफिक में ड्राइविंग ज्यादा सुरक्षित हो गई है।
ADAS तीन मुख्य तकनीकों के जरिए काम करता है सेंसर और कैमरा इनपुट, डेटा प्रोसेसिंग और AI, और ऑटोमेटिक एक्शन।
कार में लगे कैमरे और सेंसर हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। कैमरा लेन, ट्रैफिक साइन, पैदल यात्रियों और अन्य वाहनों को पहचानता है। रडार सामने-पीछे चल रही गाड़ियों की दूरी और स्पीड मापता है। LiDAR सड़क का 3D मैप बनाता है, जबकि अल्ट्रासोनिक सेंसर पार्किंग और नजदीकी वस्तुओं को पहचानते हैं।
इन सभी डाटा को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के जरिए प्रोसेस किया जाता है। सिस्टम समझता है कि सड़क पर क्या हो रहा है और ड्राइवर का व्यवहार कैसा है। खतरा महसूस होते ही तुरंत फैसला लिया जाता है।
ADAS सिस्टम तीन तरह से प्रतिक्रिया देता है बीप साउंड, वाइब्रेशन या स्क्रीन अलर्ट। जरूरत पड़ने पर हल्का ब्रेक लगाना या स्टीयरिंग को ठीक करना और गंभीर स्थिति में खुद ब्रेक लगाकर कार को कंट्रोल करना भी शामिल है।
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लेवल-1 ADAS को शुरुआती तकनीक माना जाता है। इसमें एडैप्टिव क्रूज कंट्रोल जैसे फीचर्स मिलते हैं, जो आगे चल रही गाड़ी के हिसाब से स्पीड को एडजस्ट करते हैं। हालांकि, इसमें ड्राइवर को हमेशा स्टीयरिंग पर हाथ रखना जरूरी होता है। इसे “हैंड्स-ऑन असिस्ट” भी कहा जाता है।
लेवल-2 ADAS को पार्शियल ऑटोमेशन कहा जाता है। इसमें कार खुद स्टीयरिंग, ब्रेक और एक्सीलेरेशन को कंट्रोल कर सकती है। लेन कीप असिस्ट, ऑटो पार्किंग और ऑटो ब्रेक जैसे फीचर्स इसे और स्मार्ट बनाते हैं। हालांकि, इस लेवल में भी ड्राइवर का सतर्क रहना बेहद जरूरी है। जरूरत पड़ने पर तुरंत कंट्रोल लेना पड़ सकता है। इसे “हैंड्स-ऑफ लेकिन ध्यान जरूरी” तकनीक कहा जाता है।