डोनाल्ड ट्रंप और मोजतबा खामेनेई, फोटो (सो. सोशल मीडिया) 
विदेश

'छूट तो दे दी पर बेचने को तेल...', ट्रंप के ऑफर पर ईरान का पलटवार, बढ़ सकती है दुनिया की टेंशन

US Iran Oil Sanctions: अमेरिका ने ईरानी तेल पर 30 दिन की छूट देने का ऐलान किया है लेकिन ईरान ने इसे 'झूठी उम्मीद' करार देते हुए अतिरिक्त तेल होने के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है।

अमन उपाध्याय

Iran Oil Crisis Global Impact: अमेरिका और ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक संघर्ष अब 'तेल के खेल' में तब्दील हो गया है। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल पर लगी पाबंदियों में 30 दिनों की ढील देने का फैसला किया लेकिन ईरान ने इस 'राहत' को पूरी तरह से आईना दिखा दिया है। ईरान के तेल मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके पास समुद्र में फंसा हुआ या निर्यात के लिए कोई भी अतिरिक्त तेल उपलब्ध नहीं है।

अमेरिका का दांव और छूट का गणित

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने घोषणा की थी कि 20 मार्च से 19 अप्रैल 2026 तक ईरान के उस तेल को बेचा जा सकता है जो वर्तमान में समुद्र में जहाजों पर भरा हुआ है। अमेरिका का अनुमान है कि इस छूट से लगभग 14 करोड़ बैरल तेल वैश्विक बाजार में आ सकता है। वाशिंगटन का मुख्य उद्देश्य बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाकर वैश्विक कीमतों को नीचे लाना है, ताकि अमेरिका के भीतर भी महंगाई पर लगाम लगाई जा सके।

'यह केवल दुष्प्रचार है'

ईरान ने अमेरिका के इन दावों को पूरी तरह से निराधार बताया है। ईरान के तेल मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका का यह बयान केवल तेल बाजार को 'झूठी उम्मीद' देने के लिए है। ईरान का तर्क है कि अमेरिका दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि उसकी चालें काम कर रही हैं जबकि हकीकत में इतना तेल है ही नहीं जितना अमेरिका बता रहा है।

होर्मुज की खाड़ी और संकट का गहराता साया

इस पूरे विवाद के केंद्र में होर्मुज की खाड़ी है जो वर्तमान में बंद होने की कगार पर है या वहां भारी अवरोध है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता है। होर्मुज संकट के कारण वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे दाम लगातार बढ़ रहे हैं। ट्रंप सरकार के सामने दोहरी चुनौती है: वे एक तरफ ईरान पर कड़ा सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ तेल की बढ़ती कीमतों को भी नियंत्रित करना चाहते हैं जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

भारत पर क्या होगा असर?

भले ही भारत लंबे समय से ईरान से सीधे तेल नहीं खरीद रहा है लेकिन वैश्विक बाजार में होने वाली हर हलचल का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि वैश्विक स्तर पर तेल महंगा होता है तो भारत को भी महंगी दरों पर आयात करना पड़ता है। इससे देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, जिसका सीधा असर परिवहन लागत और आम आदमी की रसोई के बजट पर पड़ता है।

यही कारण है कि भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश इस अमेरिका-ईरान 'तेल युद्ध' पर पैनी नजर रखे हुए हैं। कुल मिलाकर, यह मामला केवल तेल की खरीद-बिक्री का नहीं बल्कि एक बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा है जहां दोनों देश अपने-अपने फायदे के लिए बयानबाजी कर रहे हैं।

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