तालिबान के नए कानून में मौलवियों को अपराध की खुली छूट, फोटो (सो. एआई डिजाइन) 
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मौलवियों को अपराध की खुली छूट, तालिबान के नए कानून में अब धर्मगुरुओं पर नहीं चलेगा कोई भी केस

Taliban Clerics Law: अफगानिस्तान के तालिबान प्रशासन ने नया 'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड' जारी किया है, जिसके तहत मुल्ला और मौलवियों को अदालती कार्रवाई से मुक्त कर दिया गया है।

अमन उपाध्याय

Afghanistan Criminal Procedure Code In Hindi: अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान प्रशासन ने अपने 'न्यायिक सुधारों' के नाम पर एक ऐसा कानून पेश किया है, जिसने वैश्विक स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। तालिबान सरकार ने 'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड फॉर कोर्ट' के तहत समाज को चार अलग-अलग वर्गों में विभाजित कर दिया है। इस नए कोड के आर्टिकल 9 के तहत, अब न्याय का पैमाना व्यक्ति के अपराध पर नहीं बल्कि समाज में उसके स्थान पर निर्भर करेगा।

मौलवियों को 'कानून से ऊपर' का दर्जा

इस निर्देश की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि समाज के सबसे ऊपरी वर्ग, यानी मुल्ला और मौलवियों को किसी भी प्रकार की पुलिसिया या अदालती कार्रवाई से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है। कानून में स्पष्ट कहा गया है कि यदि ये धर्मगुरु कोई अपराध करते हैं तो उन पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।

'एक अपराध, दो सजा' की नीति

नए नियमों के तहत अब सजा का निर्धारण अपराध की गंभीरता से ज्यादा व्यक्ति के सामाजिक और आर्थिक दर्जे के आधार पर किया जाएगा। आरोप है कि इस व्यवस्था में समाज के उच्च वर्ग से जुड़े लोगों को विशेष सुरक्षा प्रदान की जाएगी और कई मामलों में उन्हें कानूनी कार्रवाई से राहत भी मिल सकती है।

वहीं दूसरी ओर, निम्न वर्ग और गरीब तबके से आने वाले लोगों के लिए नियम कहीं ज्यादा सख्त होंगे। यदि किसी आम नागरिक पर अपराध साबित होता है, तो उसे कठोर से कठोर सजा दिए जाने का प्रावधान किया गया है। इस असमान व्यवस्था को लेकर आम जनता में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

सोशल मीडिया पर लोग इस नीति की तुलना प्राचीन 'चतुर्वर्ण व्यवस्था' से कर रहे हैं, जहां व्यक्ति के जन्म और सामाजिक हैसियत के आधार पर उसके अधिकार और न्याय तय किए जाते थे। कई यूजर्स का कहना है कि यह व्यवस्था समानता और न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे समाज में भेदभाव और असंतोष और गहरा हो सकता है।

'कानूनी गुलामी' पर बवाल

तालिबान के इस कदम की चौतरफा निंदा हो रही है। नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट ने इसे 'कानूनी गुलामी' करार देते हुए कहा है कि तालिबान अब गरीबों को सजा देने और उच्च वर्ग को बचाने के लिए कानून का दुरुपयोग कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि तालिबान पहले से ही महिलाओं पर अत्याचार और भेदभावपूर्ण नीतियों के लिए बदनाम है। यह क्रूरता हाल ही में तब और स्पष्ट हुई जब तालिबान के सुप्रीम लीडर अखुंदजादा की मंजूरी पर एक 13 साल के किशोर को सरेआम मौत की सजा दी गई जिसके गवाह लगभग 80 हजार लोग बने थे।

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