श्रीलंका ने अमेरिकी लड़ाकू विमान को उतरने की अनुमति देने से इनकार किया, फोटो (सो. सोशल मीडिया) 
विदेश

श्रीलंका के कड़े तेवर! अमेरिका को नहीं दी फाइटर जेट लैंड करने की इजाजत, राष्ट्रपति बोले- हम किसी के आगे..

Iran US War: श्रीलंका ने मट्टाला एयरपोर्ट पर अमेरिकी लड़ाकू विमानों की लैंडिंग की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। राष्ट्रपति ने संसद में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वे किसी दबाव में नहीं झुकेंगे।

अमन उपाध्याय

Sri Lanka Refuses US Fighter Jet Landing: मध्य-पूर्व में जारी भीषण युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच श्रीलंका ने एक साहसिक कूटनीतिक निर्णय लेकर दुनिया को चौंका दिया है। श्रीलंका सरकार ने अपनी जमीन पर अमेरिकी जंगी जहाजों को उतारने की अनुमति देने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। शुक्रवार को श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में इस ऐतिहासिक फैसले की घोषणा करते हुए साफ किया कि उनका देश इस युद्ध में किसी भी पक्ष का हिस्सा नहीं बनेगा और अपनी तटस्थता को बनाए रखेगा।

अमेरिका के दो अनुरोधों को किया खारिज

राष्ट्रपति दिसानायके ने संसद को सूचित किया कि अमेरिका ने दो अलग-अलग मौकों पर अपने लड़ाकू विमानों को श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व में स्थित मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंड करने की अनुमति मांगी थी। ये विमान जिबूती स्थित अमेरिकी सैन्य बेस से आ रहे थे और आठ एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे। अमेरिकी प्रशासन ने 4 मार्च और 8 मार्च 2026 को ये अनुरोध किए थे लेकिन श्रीलंका सरकार ने सुरक्षा और कूटनीतिक कारणों का हवाला देते हुए इन दोनों ही प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया।

'दबाव के आगे नहीं झुकेंगे'

संसद में अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि देश पर इस संबंध में कई प्रकार के अंतरराष्ट्रीय दबाव थे। राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि कई दबावों के बावजूद हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं। हम झुकेंगे नहीं। मध्य-पूर्व का युद्ध हमारे लिए चुनौतियां खड़ी करता है लेकिन तटस्थ बने रहने के लिए हम हर संभव प्रयास करेंगे। यह बयान दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर के साथ उनकी मुलाकात के ठीक एक दिन बाद आया है, जो श्रीलंका की संप्रभुता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

ईरानी युद्धपोत पर हमला और श्रीलंका की भूमिका

इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में 4 मार्च को अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में हुई एक हिंसक झड़प भी शामिल है। अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के दक्षिणी तट से लगभग 80 किमी दूर अंतरराष्ट्रीय जल में ईरानी युद्धपोत 'IRIS Dena' पर टॉरपीडो से हमला किया था जिसमें 84 से 87 ईरानी नौसैनिक मारे गए थे।

यह जहाज भारत के विशाखापत्तनम से लौट रहा था। इस संकट के दौरान श्रीलंका ने मानवता का परिचय देते हुए ईरानी जहाज के डिस्ट्रेस सिग्नल पर तुरंत कार्रवाई की और अपनी नौसेना व वायुसेना के जरिए बड़े पैमाने पर खोज अभियान चलाया। श्रीलंका ने न केवल 32 घायल ईरानी नौसैनिकों की जान बचाई, बल्कि शहीद सैनिकों के शवों को भी ससम्मान वापस ईरान भेजा।

मानवीय आधार पर ईरान को मदद

अमेरिका की मांग ठुकराने के साथ-साथ श्रीलंका ने एक अन्य ईरानी सहायक जहाज 'IRIS Bushehr' को भी मानवीय आधार पर सहायता प्रदान की। इंजन में खराबी के कारण इस जहाज ने मदद मांगी थी जिसके बाद श्रीलंका ने उसे त्रिंकोमाली बंदरगाह भेजने का निर्देश दिया और उसके नाविकों को नौसैनिक सुविधा केंद्र में ठहराया। श्रीलंका की यह सक्रियता दर्शाती है कि वह क्षेत्र में शांति और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे रहा है न कि किसी महाशक्ति के सैन्य हितों को।

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