पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट, फोटो (सो. सोशल मीडिया)  
विदेश

'संविधान पर बड़ा हमला...', 27वें संशोधन के बाद पाकिस्तान SC के दो जजों ने दिया इस्तीफा, मचा बवाल

Pakistan Parliament Amendment: पाकिस्तान की राजनीति और न्यायपालिका गुरुवार को उस समय अस्थिर हो गई जब विवादास्पद 27वां संविधान संशोधन संसद से पारित होते ही सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों...

अमन उपाध्याय

Supreme Court Judges Resign Pakistan: पाकिस्तान की राजनीति में बड़ा संवैधानिक भूचाल उस समय आ गया जब गुरुवार शाम संसद ने विवादास्पद 27वें संविधान संशोधन को पारित किया और इसके कुछ ही घंटे बाद सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मंसूर अली शाह और न्यायमूर्ति अतहर मिनल्लाह ने अपने इस्तीफे सौंप दिए।

राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हस्ताक्षर के बाद संशोधन कानून बन गया, जिसके साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चल रही चिंता अचानक गहरी राजनीतिक बहस में बदल गई।

यह संविधान पर गंभीर हमला

न्यायमूर्ति मंसूर अली शाह ने अपना विस्तृत 13 पन्नों का इस्तीफा अंग्रेजी और उर्दू दोनों में लिखा। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने साफ कहा कि यह संशोधन पाकिस्तान के संविधान पर सीधा और खतरनाक हमला है। उनके मुताबिक, संशोधन के बाद न्यायपालिका न केवल विभाजित हो गई है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की संरचना भी खंडित हो गई है। उन्होंने लिखा कि 27वें संशोधन ने उच्चतम न्यायालय को सरकार के नियंत्रण में ला दिया है, जिससे देश दशकों पीछे चला गया। शाह ने इसे पाकिस्तान के संवैधानिक लोकतंत्र की आत्मा पर गंभीर चोट बताया।

संशोधन की नींव के नीचे समाधि

न्यायमूर्ति अतहर मिनल्लाह ने अपने त्यागपत्र में और भी कठोर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उन्हें अफसोस है कि जिस संविधान की रक्षा करने की उन्होंने शपथ ली थी वह अब संशोधन की नींव के नीचे समाधि बन चुका है।

उन्होंने बताया कि संशोधन पारित होने से पहले उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को पत्रकर प्रस्तावित बदलावों पर चिंता जताई थी लेकिन चुनिंदा चुप्पी और निष्क्रियता ने उनकी आशंकाओं को सच कर दिया। उनके अनुसार, अब जो बचा है वह केवल संविधान की एक परछाई है, जिसकी न आत्मा बची है और न ही जनता की आवाज।

मिनल्लाह ने न्यायिक वस्त्रों के महत्व पर भी टिप्पणी की और कहा कि यह केवल परिधान नहीं, बल्कि जनता द्वारा न्यायालय में जताए गए पवित्र भरोसे का प्रतीक है। लेकिन इतिहास में कई बार ये वस्त्र मौन और मिलीभगत के कारण विश्वासघात का प्रतीक बनते रहे हैं।

शाह ने पहले भी चेताया था

10 नवंबर को न्यायमूर्ति मंसूर अली शाह ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर चेताया था कि यदि न्यायपालिका एक नहीं रही तो उसकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने 26वें संविधान संशोधन के विवाद सुलझाए बिना 27वें संशोधन को आगे लाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया था।

उन्होंने संघीय संवैधानिक न्यायालय की स्थापना को भी गैर-ज़रूरी बताया क्योंकि लंबित मामलों में अधिकांश जिला स्तर पर हैं, सुप्रीम कोर्ट स्तर पर नहीं।

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