नेपाल त्रासदी  सौजन्य-IANS
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Nepal Flood Explained: नेपाल की नदियां अचानक क्यों बन जाती हैं तबाही का कारण? जानें 5 बड़ी वजहें

Nepal Flood: नेपाल में बार-बार आने वाली फ्लैश फ्लड की वजह जानना जरूरी है। हिमालय की भौगोलिक बनावट, ग्लेशियर, भूस्खलन और जलवायु परिवर्तन आखिर कैसे बढ़ाते हैं खतरा?

प्रिया जैस

Highlights:

  • ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में पानी तेजी से बढ़ने पर निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आ सकती है।

  • ऊंचे हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने से हिमनद झीलों की संख्या और आकार बढ़ गया है।

  • अर्ली वार्निंग सिस्टम, सैटेलाइट निगरानी, और जोखिम वाले इलाकों में सुरक्षित पुनर्वास।

Nepal Flood Reason: इंसान कितना भी मॉडर्न क्यों न हो जाए, लेकिन जब कुदरत के साथ खिलवाड़ करता है तो उसे इसका खामियाजा जरूर भुगतना पड़ता है। नेपाल में लगातार आ रही बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं इसी का एक उदाहरण है। नेपाल में आई भयानक बाढ़ के बाद काठमांडू के अस्पतालों का मंजर देख लोगों का कलेजा कंप रहा है।

नेपाल के भोटे कोशी में आई त्रासदी को एक महीने ही बीते थे कि 11 अक्टूबर को बुढ़ी गंडकी नदी में चुमानुवमी रूरल म्युनिसिपैलिटी-6 की तरफ से जबरदस्त बाढ़ का सामना करना पड़ा। इस बाढ़ में 35 से ज्यादा घर बह गए और एक हाइड्रोपावर प्लांट को नुकसान पहुंचा था।

भोटेकोशी बाढ़ में अभी भी हजारों लापता

रसुवा और त्रिशूली नदी के इलाकों में आई भयानक बाढ़ के एक महीने से कुछ ज्यादा समय बाद हुई है। NDRRMA के अनुसार, उस बाढ़ में 1,455 लोगों की जान चली गई थी, जबकि 5,285 लोग अभी भी लापता हैं।

यह पहली बार नहीं है कि नेपाल में इस तरह की विशाल बाढ़ आई है, इससे पहले भी बाढ़ का सामना करना पड़ा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि नेपाल में अक्सर बाढ़ का सामना क्यों करना पड़ता है। तो चलिए आपको बताते है कि आखिर इसका कारण क्या है।

नेपाल भोटे कोशी त्रासदी

नेपाल में बाढ़ से हुआ नुकसान

नेपाल बार-बार विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का सामना क्यों करता है। नेपाल में खास तौर पर नेपाल-चीन सीमा के पहाड़ी इलाकों में आने वाली भयानक फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और हिमस्खलन का कारण जानना जरूरी है।

भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में आई भीषण बाढ़ थी, जिसने रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा और चितवन जैसे जिलों को बुरी तरह प्रभावित किया। पानी का स्तर सामान्य से 15 से 20 मीटर ऊपर तक बढ़ गया, जिससे सड़कें, पुल, बिजली संयंत्र और स्थानीय बस्तियां बह गईं। अहम बात यह है कि अधिकारियों ने पाया कि यह फ्लैश फ्लड नेपाल के अंदर शुरू नहीं हुई थी, बल्कि सीमा के उस पार तिब्बती पठार पर शुरू हुई थी।

त्रासदी से पहले और बाद की तस्वीर

भौगोलिक और जलवायु से संबंधित कारण

इन बार-बार होने वाली नेपाल त्रासदियों के पीछे मुख्य कारण उत्तरी हिमालयी सीमा की खास भौगोलिक बनावट है। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र सीमा के उस पार ऊंचे तिब्बती पठार पर स्थित है, जबकि नेपाल ठीक नीचे की ओर खड़ी ढलानों पर बसा है। चूंकि इन खड़ी घाटियों के किनारे कई शहर, सड़कें, पुल और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स मौजूद हैं, इसलिए ऊपरी हिस्से में पानी का अचानक बढ़ना निचले इलाकों में तेजी से भारी तबाही मचाता है।

इसके अलावा, ऊंचे हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने से हिमनद झीलों की संख्या और आकार बढ़ गया है। गर्मियों और मानसून के दौरान, भारी बारिश के साथ-साथ खिसकते ग्लेशियर, हिमस्खलन और पिघलती बर्फ मिलकर भारी मात्रा में पानी, कीचड़, रेत और बड़े-बड़े पत्थरों को संकरी नदी की तलहटी में तेजी से धकेलते हैं।

नेपाल त्रासदी

हिमालय और तिब्बत के ऊंचे इलाकों में ग्लेशियल झीलों के फटने के कई प्राकृतिक और मौसमी कारण होते हैं।

बांध की क्षमता से ज्यादा पानी जमा होना

ग्लेशियरों के पिघलने से ग्लेशियल झीलों में लगातार पानी आता रहता है। अगर जमा हुए पानी की मात्रा प्राकृतिक बांध या मोरेन (मलबे के ढेर) की क्षमता से ज्यादा हो जाती है, तो झील अचानक फट सकती है।

झील में हिमस्खलन (Avalanche) का गिरना

ऊंचे पहाड़ों में ग्लेशियरों का टूटना और हिमस्खलन आम बात है। जब कोई हिमस्खलन सीधे ग्लेशियल झील में गिरता है, तो पानी अचानक अपनी जगह से हटकर किनारों के ऊपर से बहने लगता है, जिससे झील फट जाती है।

बढ़ता तापमान और जलवायु में बदलाव

हिमालय के ऊंचे इलाकों में बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के बनने-बिगड़ने की प्रक्रिया को तेज करता है और झीलों में पिघले हुए पानी की मात्रा को बढ़ाता है।

लगातार भारी बारिश

मॉनसून के मौसम में लगातार और भारी बारिश से झीलों और उनके आस-पास की रुकावटों पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है।

भूकंप के झटके

भूकंपीय कंपन ग्लेशियल झील के बांधों की हालत और बनावट की मजबूती को बदल सकते हैं, जिससे वे कमजोर होकर टूट सकते हैं। जब इनमें से कोई भी कारण झील को नुकसान पहुंचाता है, तो पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। रास्ते में यह कीचड़, रेत और बड़े पत्थरों और सामने आने वाले सभी अवरोधों को अपने साथ बहा ले जाता है, जिससे भयानक फ्लैश फ्लड और मलबे का बहाव पैदा होता है।

हिमालयी बेसिन में पहले हुई ऐसी घटनाएं

रसुवा बाढ़ 2025:

रसुवा इलाके में एक बड़ी बाढ़ आई, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हुआ। आपदा के बाद की जांच से पता चला कि यह बाढ़ ल्हेन्डे खोला के ऊपरी कैचमेंट एरिया में ग्लेशियल झील के फटने के कारण आई थी।

जब पानी का तेज बहाव नीचे की ओर आया, तो वह अपने साथ भारी मात्रा में पत्थर, कीचड़ और रेत ले आया, जिससे भोटे कोशी नदी के किनारे बनी सड़कों, पुलों, बिजली संयंत्रों, बस्तियों और जरूरी बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचा।

थामे फ्लैश फ्लड (2024)

2024 में, सोलुखुम्बु जिले की खुम्बु पसंगल्हामु रूरल म्युनिसिपैलिटी में स्थित थामे में लगातार 48 घंटे बारिश के बाद अचानक बाढ़ आई। इस तेज बाढ़ ने भारी तबाही मचाई और इलाके में दर्जनों घरों को नुकसान पहुंचाया। इस त्रासदी में 241 लोगों की मौत हो गई, जबकि 400 से ज्यादा लोगों को बचाया गया।

थामे फ्लैश फ्लड

कोदारी आपदा (2016)

2016 में, तिब्बत में सीमा के उस पार एक ग्लेशियल झील के फटने के बाद कोदारी इलाके में एक भयानक बाढ़ आई। बाढ़ के पानी ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। इससे कोदारी और तातोपानी में इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा, अरनिको हाईवे का कुछ हिस्सा बह गया और अपर भोटे कोशी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को भी गंभीर नुकसान हुआ।

सैटेलाइट मॉनिटरिंग

त्रासदी से बचाव कैसे कर सकते है?

चूंकि ये प्राकृतिक प्रक्रियाएं मौसम और भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करती हैं, इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि इन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन जोखिम कम करने वाली रणनीतियों से जानें बचाई जा सकती हैं।

अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): ग्लेशियर झीलों के पास ऑटोमेटेड सेंसर लगाने से पानी के स्तर और बांध की स्थिरता के बारे में रियल-टाइम डेटा मिल सकता है, हालांकि ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में इन्हें लगाने का काम अभी शुरुआती दौर में है।

सैटेलाइट मॉनिटरिंग: चूंकि स्रोत वाले इलाके दूर-दराज और आबादी से दूर होते हैं, इसलिए बदलावों का रियल-टाइम पता लगाने के लिए सैटेलाइट ट्रैकिंग स्टेशन जरूरी हैं।

सीमा-पार तालमेल: चूंकि कई बाढ़ तिब्बत से शुरू होती हैं, इसलिए शुरुआती चेतावनी के लिए चीन के साथ एक संस्थागत द्विपक्षीय व्यवस्था बनाना बहुत जरूरी है।

सुरक्षित पुनर्वास: नदी के किनारे खतरनाक इलाकों में निर्माण पर रोक लगाना और खतरे वाले गांवों को दूसरी सुरक्षित जगहों पर बसाना सबसे असरदार और लंबे समय तक काम आने वाला बचाव उपाय माना जाता है।

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