इंसानी पेशाब भी पिघला रहा है ग्लेशियर? रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा, जानिए असली वजह

Why Glacier Melt: क्या पर्वतारोहियों का पेशाब भी ग्लेशियर पिघलने की वजह बन रहा है? नई रिसर्च में इंसानी गतिविधियों, ईंधन और ग्लेशियर मेल्ट के बीच चौंकाने वाला संबंध सामने आया है।
Causes of Glacier Melting
सांकेतिक तस्वीरAI Image
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Causes of Glacier Melting: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की चर्चा आमतौर पर ग्लोबल वार्मिंग, बढ़ते तापमान और फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल के संदर्भ में होती है। लेकिन क्या इंसानी गतिविधियां भी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रही हैं? हाल ही में सामने आई एक रिसर्च ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।

रिसर्च के मुताबिक, दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटियों पर पर्वतारोहियों की मौजूदगी भी स्थानीय स्तर पर ग्लेशियरों पर गर्मी का असर बढ़ा सकती है। यहां तक कि पर्वतारोहियों के शरीर से निकलने वाला पेशाब भी एक छोटी लेकिन मापी जा सकने वाली मात्रा में बर्फ पिघलाने में योगदान देता है।

नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों के एक समूह की यह स्टडी Regional Environmental Change जर्नल में प्रकाशित हुई है। इसमें पर्वतारोहण अभियानों के दौरान ग्लेशियर पर होने वाली मानवीय गतिविधियों और उनसे पैदा होने वाली गर्मी का अध्ययन किया गया है।

बेस कैंप पर हर साल लगते हैं सैकड़ों टेंट

रिसर्च में बताया गया है कि हर क्लाइंबिंग सीजन में ग्लेशियर पर करीब 1,600 टेंट लगाए जाते हैं। इन कैंपों में सिर्फ रहने की व्यवस्था ही नहीं होती, बल्कि किचन, शॉवर, जनरेटर, वाई-फाई और कुछ जगहों पर गर्म फर्श जैसी सुविधाएं भी इस्तेमाल की जाती हैं।

इन सुविधाओं के लिए ईंधन जलाया जाता है और इससे गर्मी पैदा होती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां ग्लेशियर की सतह के आसपास स्थानीय तापमान और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।

इंसानी पेशाब भी बन रहा है गर्मी का एक स्रोत

रिसर्च का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा पर्वतारोहियों के पेशाब से जुड़ा है। अधिक ऊंचाई पर पर्वतारोहियों को ज्यादा पानी पीना पड़ता है, जिसके कारण पेशाब की मात्रा भी बढ़ जाती है।

स्टडी में अनुमान लगाया गया कि 2023 के क्लाइंबिंग सीजन के दौरान प्रतिदिन करीब 6,766 लीटर पेशाब उत्पन्न हुआ। वैज्ञानिकों के मुताबिक, शरीर से बाहर निकलते समय इसका तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस होता है। इसलिए इसमें मौजूद गर्मी का एक छोटा हिस्सा आसपास की बर्फ को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ग्लेशियर के पिघलने की मुख्य वजह इंसानी पेशाब है। वैज्ञानिकों ने खुद माना है कि इसका प्रभाव सीमित है। शरीर से बाहर निकलने के बाद पेशाब तेजी से ठंडा होता है और उसकी गर्मी का बहुत कम हिस्सा वास्तव में बर्फ तक पहुंचता है। बाकी ऊर्जा वातावरण और आसपास की चट्टानों में चली जाती है।

2023 में 154 टन बर्फ पिघलने का अनुमान

रिसर्च में 2023 के क्लाइंबिंग सीजन से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि उस दौरान मानवीय गतिविधियों से जुड़ी गर्मी के कारण कुल मिलाकर करीब 154 टन बर्फ पिघलने की संभावना थी।

लेकिन इस आंकड़े में सबसे बड़ा योगदान पेशाब का नहीं, बल्कि बेस कैंप में इस्तेमाल होने वाले ईंधन का था।

LPG, केरोसिन और पेट्रोल से पैदा हुई ज्यादा गर्मी

स्टडी के मुताबिक, अकेले 2023 में बेस कैंप पर खाना पकाने, हीटिंग और बिजली से जुड़ी जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन इस्तेमाल हुआ। इसमें करीब 824 LPG सिलेंडर, 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर गैसोलीन शामिल थे।

वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार, इंसानी गतिविधियों से संबंधित बर्फ पिघलने में करीब 94 प्रतिशत योगदान ईंधन के इस्तेमाल से पैदा हुई गर्मी का था, जबकि लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा पेशाब से जुड़ी गर्मी का माना गया।

यानी पेशाब का प्रभाव भले ही सुनने में चौंकाने वाला हो, लेकिन वास्तविक तस्वीर में ईंधन की खपत कहीं बड़ा कारक दिखाई देती है।

हिमालय में तेजी से बढ़ रहा तापमान

वैज्ञानिकों की चिंता सिर्फ पर्वतारोहण अभियानों तक सीमित नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने को लेकर पहले से ही कई अध्ययन चेतावनी दे चुके हैं।

2019 में Science Advances में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, साल 2000 के बाद हिमालयी क्षेत्र में बर्फ पिघलने की दर पिछली अवधि की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई थी।

खुम्बु ग्लेशियर के बेस कैंप क्षेत्र की सतह के तापमान में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिसर्च में इसकी दर करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस बताई गई है।

वैज्ञानिकों ने बेहतर मैनेजमेंट पर दिया जोर

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों पर मानवीय गतिविधियों को पूरी तरह खत्म करना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन उनके प्रभाव को कम जरूर किया जा सकता है।

इसके लिए बेस कैंप में ईंधन की खपत कम करने, सौर ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने और कैंप की लोकेशन को लेकर नए विकल्पों पर विचार करने की जरूरत बताई गई है।

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