मोरक्को इस बार बकरीद पर नहीं देगा जानवर की कुर्बानी, फोटो (सो. सोशल मीडिया) 
विदेश

बकरीद पर नहीं होगी कुर्बानी! इस मुस्लिम देश ने लिया ऐतिहासिक फैसला, दुनिया भर के मुसलमानों को बड़ा संदेश

मोरक्को ने इस बार बकरीद पर किसी भी जानवर की कुर्बानी न करने का फैसला लिया है। इसी वजह से वहां के सभी पशु बाजार बंद कर दिए गए हैं। मोरक्को का यह कदम भारत समेत पूरी दुनिया के मुस्लिम समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश..

अमन उपाध्याय

रबात: बकरीद के मौके पर दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक अहम संदेश देते हुए एक इस्लामिक देश ने इस बार किसी भी जानवर की कुर्बानी न करने का फैसला किया है। यह देश है मुस्लिम आबादी वाला मोरक्को। मोरक्को की सरकार ने ईद-अल-अजहा से पहले ही वहां के सभी पशु बाजार बंद कर दिए हैं और बकरे सहित किसी भी जानवर की कुर्बानी पर पूरी तरह रोक लगा दी है।

ईद-अल-अजहा से पहले पारंपरिक पशु बलि को रोकने के शाही आदेश जारी किए गए हैं। इसके बाद, मोरक्को प्रशासन ने पूरे देश में पशु बाजारों को बंद करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। इस कदम का मकसद घटती हुई पशुधन संख्या की सुरक्षा करना और संकट में फंसे समुदायों पर पड़ रहे दबाव को कम करना है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, किंग मोहम्मद VI ने इस वर्ष पारंपरिक पशु बलि को रद्द करने का फैसला किया है। यह निर्णय देश में चल रहे सूखे और आर्थिक परेशानियों को देखते हुए लिया गया है, जिनकी वजह से पशुधन की संख्या में भारी कमी आई है।

बूचड़खानें अस्थायी तौर पर बंद

पशुओं की बलि को रोकने के लिए प्रशासन ने देश भर के गवर्नरों और स्थानीय अधिकारियों को निर्देश भेजे हैं। उन्हें इस प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करने का आदेश दिया गया है। खासतौर पर ईद के पहले जो सार्वजनिक और मौसमी पशु बाजार सामान्यतः चलाए जाते हैं, उन्हें बंद करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार कई प्रांतों ने सभी साप्ताहिक भेड़ बाजारों को बंद कर दिया है, बलि से जुड़ी सभी सभाओं पर रोक लगा दी है, नगरपालिका बूचड़खानों को अस्थायी तौर पर बंद कर दिया है और कुछ इलाकों में बलि के उपकरणों की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।

देश भर में पशुओं की सुरक्षा के लिए किंग मोहम्मद VI का यह आदेश दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण और सीख है। किंग ने इस साल की शुरुआत में मोरक्को के लोगों से पारंपरिक बलि करने से बचने की अपील की थी, ताकि मांस की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे परिवारों पर आर्थिक दबाव कम हो और पशुधन की घटती संख्या को संरक्षित किया जा सके।

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