नरेंद्र मोदी और बालेन शाह, फोटो (सो. सोशल मीडिया) 
विदेश

Explainer: क्या है लिपुलेख विवाद? समझिए कैलाश मानसरोवर यात्रा पर छिड़े बहस की पूरी कहानी

Kailash Mansarovar Yatra: नेपाल की बालेंद्र शाह सरकार ने लिपुलेख पास के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने के भारत के फैसले पर आपत्ति जताई है। जानिए आखिर क्या है विवाद?

अमन उपाध्याय

Kailash Mansarovar Yatra Dispute Explainer In Hindi: कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 के आगामी सत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच कूटनीतिक तनाव गहरा गया है। नेपाल की बालेंद्र शाह सरकार ने लिपुलेख पास के इस्तेमाल को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा है कि इस क्षेत्र का उपयोग भारत और चीन के बीच यात्रा के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

कब शुरू हुआ ये विवाद?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को घोषणा की कि कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 फिर से शुरू होगी। इस योजना के तहत जून से अगस्त के बीच 50-50 तीर्थयात्रियों के कुल दस बैच उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के रास्ते तिब्बत जाने वाले हैं। इसके जवाब में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार को आधिकारिक बयान जारी कर लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को 1816 की सुगौली संधि के आधार पर नेपाल का अभिन्न हिस्सा बताया। नेपाल ने कूटनीतिक माध्यमों से भारत और चीन दोनों को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है और मांग की है कि भारत इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियों से दूर रहे।

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर सरकार ने क्या कहा?

ऐतिहासिक तथ्यों और परंपरा का हवाला नेपाल के दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि भारत का रुख इस मुद्दे पर हमेशा से साफ रहा है। उन्होंने कहा कि लिपुलेख दर्रा 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक पारंपरिक और पुराना रास्ता रहा है और इस पर दशकों से यात्रा होती आ रही है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा भारत-नेपाल विवाद, इन्फोग्राफिक

भारत ने नेपाल के क्षेत्रीय दावों को खारिज करते हुए कहा कि ये दावे न तो सही हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों या सबूतों पर आधारित हैं। जायसवाल ने जोर देकर कहा कि इस तरह के एकतरफा और बनावटी दावों को बढ़ाना उचित नहीं है हालांकि भारत बातचीत और डिप्लोमेसी के जरिए सीमा विवाद सुलझाने के लिए हमेशा तैयार है।

क्या है पुराना समझौता?

लिपुलेख पास रणनीतिक रूप से भारत के उत्तराखंड, नेपाल और चीन का एक त्रिकोणीय जंक्शन है जिस पर 1962 के बाद से ही भारतीय सेना का नियंत्रण रहा है। भारत और चीन ने पहले 2015 में और फिर 2025 में इस मार्ग को व्यापार और यात्रा के लिए खोलने पर सहमति जताई थी।

हालांकि, नेपाल इन समझौतों का हिस्सा नहीं था और उसने लगातार अपनी नाराजगी व्यक्त की है। पूर्व नेपाली पीएम केपी शर्मा ओली ने भी इस मुद्दे को चीनी नेतृत्व के सामने उठाया था लेकिन इसका कोई ठोस हल नहीं निकल सका। फिलहाल, भारत अपनी योजना के अनुसार यात्रा की तैयारियों में जुटा है जबकि नेपाल इसे अपनी संप्रभुता का मुद्दा बना रहा है।

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