इराक के नए प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी, फोटो (सो. सोशल मीडिया) 
विदेश

मिडिल ईस्ट में पलटा पासा! ईरान के 'खास' नूरी अल-मलिकी फिर बनेंगे इराक के PM, अमेरिका की बढ़ी टेंशन

Middle East News in Hindi: इराक के शिया गठबंधन ने ईरान समर्थक नूरी अल-मलिकी को प्रधानमंत्री पद के लिए नामित किया है। इस फैसले से भड़के अमेरिका ने इसे गलत बताते हुए इराक को चेतावनी दी है।

अमन उपाध्याय

Iraq US Tension News In Hindi: मिडिल ईस्ट में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिशों में जुटे अमेरिका को इराक में एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। इराक के शक्तिशाली शिया गठबंधन ने प्रधानमंत्री पद के लिए नूरी अल-मलिकी के नाम का प्रस्ताव रखा है। मलिकी की संभावित वापसी ने न केवल इराक की राजनीति में हलचल मचा दी है बल्कि जो बाइडन प्रशासन और अमेरिकी विदेश विभाग को भारी तनाव में डाल दिया है।

अमेरिका का कड़ा विरोध

मलिकी के नाम के ऐलान के साथ ही अमेरिका ने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इराक के निवर्तमान प्रधानमंत्री अल-सुडानी को फोन कर इस फैसले को पूरी तरह गलत बताया है। रुबियो ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका किसी भी सूरत में इसे स्वीकार नहीं करेगा। विदेश विभाग के अनुसार, ईरान द्वारा नियंत्रित कोई भी सरकार इराक के अपने हितों और अमेरिका के साथ पारस्परिक साझेदारी को प्राथमिकता नहीं दे सकती।

कौन हैं नूरी अल-मलिकी?

75 वर्षीय नूरी अल-मलिकी का जन्म इराक के अल हिंडिया प्रांत में हुआ था। वे 1980 के दशक में शिया विद्रोही आंदोलन में शामिल हुए थे और सद्दाम हुसैन के शासन के दौरान उन्हें 24 साल निर्वासन में बिताने पड़े। इस दौरान उन्होंने ईरान में शरण ली जहां वे ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बेहद करीबी बन गए। 2003 में सद्दाम की सत्ता जाने के बाद वे लौटे और 2006 से 2014 तक इराक के प्रधानमंत्री रहे। हालांकि, 2014 में भ्रष्टाचार के आरोपों और अमेरिकी दबाव के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

अमेरिका के लिए यह बड़ा झटका क्यों है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मलिकी सत्ता में आते हैं, तो इससे अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति को गंभीर झटका लग सकता है। उनका कहना है कि मलिकी का नेतृत्व पूरे मध्य-पूर्व की राजनीतिक और सैन्य समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। सबसे पहले, बफर जोन की भूमिका को लेकर चिंता जताई जा रही है। इराक और ईरान के बीच लगभग 1500 किलोमीटर लंबी सीमा है। यदि मलिकी प्रधानमंत्री बनते हैं तो संकट या युद्ध की स्थिति में ईरान इराक को एक सुरक्षित बफर जोन के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। इससे ईरान को रणनीतिक रूप से बड़ा फायदा मिल सकता है।

मिलिशिया गुटों से जुड़ा मुद्दा

दूसरा बड़ा मुद्दा मिलिशिया गुटों से जुड़ा है। इराक में पहले से ही कई ऐसे सशस्त्र गुट सक्रिय हैं, जो ईरान समर्थित माने जाते हैं। मलिकी के सत्ता में आने के बाद इन गुटों को सरकारी संरक्षण और समर्थन मिलने की आशंका जताई जा रही है। इससे उनकी ताकत और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और हिंसा और ज्यादा बढ़ सकती है।

इराक का हवाई क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण

तीसरा अहम पहलू हवाई क्षेत्र को लेकर है। ईरान पर किसी भी संभावित हमले के लिए इराक का हवाई क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि सऊदी अरब पहले ही अपने हवाई मार्ग के इस्तेमाल से इनकार कर चुका है। ऐसे में यदि मलिकी सत्ता में रहते हैं, तो इराक का हवाई क्षेत्र ईरान के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच बन सकता है, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों की सैन्य योजनाओं को नुकसान पहुंचेगा।

इस बीच, ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी प्रेस टीवी के अनुसार, इराक की सभी शिया बहुल राजनीतिक पार्टियां मलिकी के नाम पर एकजुट हो चुकी हैं। इन पार्टियों के बीच सहमति बनने के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि मलिकी ही अगले प्रधानमंत्री होंगे।

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