संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश (सोर्स- सोशल मीडिया) 
विदेश

Balochistan Issue: यूएन में भारत ने उठाया बलूचिस्तान मुद्दा, संसाधनों के दोहन पर पाक को घेरा

Balochistan Issue: संयुक्त राष्ट्र में भारत ने बलूचिस्तान मुद्दा उठाया है। भारत ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से बलूच लोगों में असंतोष है। संसाधनों में उचित हिस्सेदारी देना जरूरी है।

प्रिया सिंह

Balochistan Issue UN Speech India: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में बलूचिस्तान के लोगों का पक्ष बहुत ही मजबूती के साथ रखा है। भारत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि खनिज और अन्य प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध बलूचिस्तान का लंबे समय से लगातार बुरी तरह से शोषण किया जा रहा है। इसी भारी शोषण के कारण वहां के स्थानीय लोगों में इस्लामाबाद के खिलाफ असंतोष और विद्रोह की भावना बहुत ज्यादा बढ़ गई है। बलूच लोग अपने ही प्रांत के अहम योगदान में अपना सही और उचित हिस्सा मांगते हुए लगातार कड़ा विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने बुधवार को इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर एक बहुत ही कड़ा बयान दुनिया के सामने दिया। उन्होंने साफ कहा कि तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों से समृद्ध प्रांतों को संसाधनों के लाभ में न्यायसंगत हिस्सेदारी मिलना बेहद जरूरी है। हरीश ने चेतावनी देते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर प्रांतों में सुरक्षा का सख्त रवैया हालात को और भी ज्यादा खराब कर देता है। ऐसे इलाके विकास में पिछड़ने के बाद पूरी तरह से असुरक्षा का केंद्र बन जाते हैं और अस्थिरता तेजी से सीमा पार फैलने लगती है।

प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने 'नेचुरल रिसोर्स गवर्नेंस' के विषय पर आयोजित एक उच्चस्तरीय खुली चर्चा में अपना कड़ा और स्पष्ट रुख पेश किया। भारतीय प्रतिनिधि पी. हरीश ने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की मुख्य जिम्मेदारी हमेशा संप्रभु देशों की ही होती है। संसाधनों का सही इस्तेमाल विकास और खुशहाली का अहम इंजन होना चाहिए, ताकि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को इसका सीधा फायदा मिल सके। यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी भारत की बात का समर्थन करते हुए कहा कि किसी भी कम्युनिटी को सबसे पहले अपने आस-पास के संसाधनों का लाभ मिलना चाहिए।

बाहरी दखल और बढ़ती अस्थिरता

भारत ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि बलूचिस्तान जैसे अशांत इलाकों में अस्थिरता के कारण बाहरी लोगों का दखल बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। यह गंभीर अस्थिरता सीमा पार से लगातार घुसपैठ और प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन को काफी हद तक आकर्षित करती है, जिससे संकट और गहराता है। भारत का यह भी मानना है कि कुछ गंभीर स्थितियों में प्राकृतिक संसाधनों की तस्करी खतरनाक हथियारबंद समूहों की बहुत बड़ी आर्थिक मदद करती है। ऐसे हालात में स्थानीय समुदायों की जायज शिकायतें काफी बढ़ जाती हैं और लड़ाई बहुत लंबे समय तक बिना किसी नतीजे के खिंचती चली जाती है।

ग्लोबल साउथ और औपनिवेशिक विरासत

पी. हरीश ने ग्लोबल साउथ के देशों का जिक्र करते हुए कहा कि औपनिवेशिक दौर में इन गरीब देशों के संसाधनों का बहुत भारी शोषण हुआ है। सबसे बड़े दुख की बात यह है कि आज भी दुनिया में वही पुरानी प्रवृत्ति जारी है, जिसमें संसाधन इन गरीब देशों से लगातार निकाले जा रहे हैं।

इन कीमती संसाधनों का बड़ा आर्थिक लाभ कहीं और पहुंच जाता है, जबकि वहां के स्थानीय और गरीब लोगों को सिर्फ पर्यावरणीय और भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। यह संप्रभुता का बड़ा अंतर सबसे ज्यादा अफ्रीका में साफ दिखता है, जहां देश अपने ही संसाधनों के सही मूल्य से पूरी तरह से वंचित रह जाते हैं।

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