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DIA की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन 2020 के दशक के आखिर तक अंतरिक्ष में लेजर हथियार तैनात करने की क्षमता हासिल कर सकता है।
लेजर और माइक्रोवेव हथियार सैटेलाइट के कैमरों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
GPS, निगरानी, संचार और मिसाइल चेतावनी जैसी सैन्य सेवाएं सैटेलाइट पर निर्भर हैं।
China Laser Weapons In Space: चीन अपनी सैन्य ताकत को अब अंतरिक्ष तक विस्तार देने की तैयारी में है। अमेरिकी सुरक्षा खुफिया एजेंसी (DIA) की नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन 2020 के दशक के आखिर तक ऐसे लेजर और डायरेक्टेड-एनर्जी हथियार तैनात करने की क्षमता हासिल कर सकता है, जो बिना मिसाइल दागे दुश्मन के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इन हथियारों से अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट के कैमरे, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को निशाना बनाया जा सकता है। अगर चीन इस तकनीक में सफल होता है, तो भविष्य के युद्ध में उसे बड़ी रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। आखिर कैसे काम करते हैं चीन के ये लेजर हथियार और क्यों अमेरिका की बढ़ सकती है चिंता?
बता दें कि DIA की रिपोर्ट Challenges to Security in Space में अंतरिक्ष में बढ़ते सैन्य खतरों का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि चीन ऐसे डायरेक्टेड-एनर्जी हथियार विकसित कर रहा है, जिनमें तेज लेजर किरणों और शक्तिशाली माइक्रोवेव तरंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन हथियारों की खास बात यह है कि इन्हें किसी सैटेलाइट को मिसाइल से टक्कर मारकर नष्ट करने की जरूरत नहीं होगी। ये दूर से ही उसके जरूरी उपकरणों को निशाना बना सकते हैं। इससे सैटेलाइट का कैमरा कुछ समय के लिए काम करना बंद कर सकता है या उसके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।
आज के समय में किसी भी आधुनिक सेना के लिए सैटेलाइट बहुत जरूरी हैं। इनके जरिए सैनिकों को सही लोकेशन की जानकारी मिलती है। लड़ाकू विमान, युद्धपोत और जमीन पर मौजूद सैनिक आपस में संपर्क बनाए रखते हैं। इसके अलावा दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और मिसाइल हमले की चेतावनी देने में भी सैटेलाइट अहम भूमिका निभाते हैं।
अगर किसी देश के जरूरी सैटेलाइट काम करना बंद कर दें, तो उसकी सैन्य व्यवस्था पर कई तरह से असर पड़ सकता है।
GPS और नेविगेशन पर असर: लड़ाकू विमानों, जहाजों और मिसाइलों को सही दिशा और लोकेशन मिलने में परेशानी हो सकती है।
निगरानी में कमी: दुश्मन की सेना और सैन्य ठिकानों की गतिविधियों पर नजर रखना मुश्किल हो सकता है।
संचार व्यवस्था प्रभावित: अलग-अलग जगहों पर तैनात सैनिकों और सैन्य इकाइयों के बीच संपर्क कमजोर पड़ सकता है।
मिसाइल चेतावनी में परेशानी: अंतरिक्ष से मिलने वाले शुरुआती संकेत प्रभावित होने पर हमले की जानकारी मिलने में देरी हो सकती है।
यानी सैटेलाइट पर हमला किसी देश की सैन्य ताकत को सीधे कमजोर कर सकता है, भले ही जमीन पर कोई बड़ा विस्फोट न हो।
सैटेलाइट में कई तरह के कैमरे, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगे होते हैं। ये उपकरण अंतरिक्ष से धरती की तस्वीरें लेते हैं और जरूरी जानकारियां भेजते हैं।
अगर कोई शक्तिशाली लेजर इन कैमरों पर डाला जाए, तो वे कुछ समय के लिए तेज रोशनी के कारण काम करना बंद कर सकते हैं। इसे अस्थायी रूप से अंधा करना कहा जाता है।
ज्यादा ताकतवर लेजर से कैमरे के संवेदनशील हिस्सों को स्थायी नुकसान भी पहुंचाया जा सकता है। इसी तरह शक्तिशाली माइक्रोवेव तरंगों से सैटेलाइट के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को प्रभावित किया जा सकता है।
चीन और अमेरिका के बीच ताइवान को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी दोनों देशों की सैन्य गतिविधियां लगातार बनी हुई हैं।
ऐसी स्थिति में अगर चीन के पास दुश्मन के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाने वाले प्रभावी हथियार होते हैं, तो संभावित युद्ध में उसे रणनीतिक फायदा मिल सकता है। अमेरिकी सेना अपने वैश्विक अभियानों में GPS, निगरानी और सुरक्षित संचार के लिए अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती है।
अगर इन प्रणालियों को नुकसान पहुंचता है, तो अमेरिका के लिए सैन्य गतिविधियों का तालमेल बनाए रखना और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सैटेलाइट प्रभावित होते ही पूरी अमेरिकी सैन्य व्यवस्था ठप हो जाएगी। सेना के पास दूसरे संचार और नेविगेशन विकल्प भी होते हैं।
DIA की रिपोर्ट में चीन के साथ रूस की अंतरिक्ष संबंधी सैन्य क्षमताओं को लेकर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देश अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की अंतरिक्ष तकनीक पर निर्भरता को समझते हैं और इस कमजोरी का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं।
अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियां बढ़ने के साथ सैटेलाइट की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अब देशों को केवल जमीन, समुद्र और आसमान में अपनी रक्षा मजबूत करने के बजाय अंतरिक्ष में मौजूद अपने जरूरी उपकरणों को भी सुरक्षित रखना होगा।
पहले युद्ध में जीत का फैसला जमीन पर सेना की ताकत, हथियारों और रणनीति से होता था। लेकिन अब आधुनिक युद्ध में तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
सैटेलाइट के जरिए मिलने वाली जानकारी और संचार व्यवस्था किसी भी सैन्य अभियान के लिए बेहद जरूरी हो गई है। DIA की रिपोर्ट का संकेत है कि भविष्य में अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट को निशाना बनाना भी युद्ध की रणनीति का हिस्सा बन सकता है।