Uttar Pradesh New OBC commission: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए सोमवार (18 मई) को योगी कैबिनेट ने बड़ी घोषणा की है। दरअसल, त्रि-स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए आरक्षण तय करने के लिए यूपी राज्य समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दे दी। यह कदम स्थानीय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दिए गए निर्देशों के मुताबिक है।
गौरतलब है मार्च, 2026 में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद HC ने आयोग के गठन में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया था। इसके साथ ही कोर्ट ने पूछा था कि क्या यह प्रक्रिया 26 मई को पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल खत्म होने से पहले पूरा हो जाएगा। अब सरकार ने इसके गठन कों मंजूरी दे दी है। लेकिन इस कदम का पंचायत चुनाव और 2027 विधानसभा चुनाव पर क्या असर होगा। आइए सबकुछ विस्तार से समझते हैं।
कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि राज्य सरकार स्थानीय चुनावों में अन्य पिछड़े वर्गों को सिर्फ राजनीतिक आरक्षण नहीं दे सकते। उन्हें पहले एक सख्त 'ट्रिपल टेस्ट' पास करना होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार इस आयोग के गठन के जरिए, राज्य में वोटिंग का रास्ता कानूनी तौर पर साफ करने के लिए पहला काम कर रहा है।
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव एक बहुत बड़ा मामला है, जिसमें पंचायत के अलग-अलग स्तर पर 8 लाख से ज्यादा पद शामिल हैं। 2021 के चुनावों में 58,189 ग्राम पंचायतों के 7.32 लाख वार्ड, 826 क्षेत्र पंचायतों के 75,855 वार्ड और 75 जिला पंचायतों के 3,051 सदस्यों के लिए चुनाव हुए थे। हालांकि, राज्य में पंचायत चुनाव राजनीतिक पार्टियों के सिंबल पर नहीं लड़े जाते, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में जमीनी स्तर के प्रतिनिधियों की अहम भूमिका को देखते हुए, बड़ी राजनीतिक पार्टियां ग्राउंड लेवल के चुनावों को अपनी ताकत दिखाने के लिए एक अहम मैदान मान रही हैं। वहीं, 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय और यहां तक कि श्रेत्रिय पार्टियां भी अपनी जमीन और मोल-भाव की ताकत को मजबूत करने के लिए पंचायत चुनावों पर नजर गड़ाए हुए हैं।
1. पिछड़ेपन की व्यवहारिक जांच कैबिनेट नोट के मुताबिक, आयोग पूरे राज्य में अन्य पिछड़े वर्गों के समुदायों में पिछड़ेपन के प्रकृति, हद और असर का पता लगाने के लिए एक विस्तृत और ताजा व्यवाहारिक अध्यन करेगा। नतीजों के आधार पर पैनल ग्रामीण लोकल बॉडी में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के अनुपात और तरीके की सिफारिश करेगा।
आयोग उत्तर प्रदेश पंचायत राज एक्ट, 1947 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत अधिनियम, 1961 के तहत आरक्षण से जुड़े नियमों की जांच करेगा। यह इनके तहत ऑपरेशनल फ्रेमवर्क का भी रिव्यू करेगा।
अधिकारियों ने कहा कि ये नियम ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों में सदस्यों और चेयरपर्सन के लिए सीटों के आरक्षण और आवंटन को नियंत्रित करेगा।
कैबिनेट नोट के अनुसार, संविधान के आर्टिकल 243D और संबंधित राज्य कानूनों के तहत, पंचायत निकायों में अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण दिया गया है। कैबिनेट नोट में कहा गया है कि SC और ST के लिए आरक्षण उनकी आबादी के हिसाब से जारी रहेगा, जबकि पंचायतों में ओबीसी आरक्षण कुल सीटों के 27% पर ही रहेगा। नोट में आगे बताया गया है कि अगर पिछड़े वर्गों के लिए ताजा आबादी का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, तो उनकी आबादी का पता एक तय सर्वे प्रोसेस से लगाया जा सकता है।
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इसमें पिछड़े वर्गों के मुद्दों की एक्सपर्टीज और जानकारी रखने वाले पांच सदस्य होंगे, जिन्हें उत्तर प्रदेश सरकार नियुक्त करेगी। सदस्यों में से एक रिटायर्ड हाई कोर्ट जज होंगे, जो चेयरपर्सन के तौर पर काम करेंगे। अधिकारियों ने बताया कि चेयरपर्सन और सदस्यों का कार्यकाल आम तौर पर छह महीने का होगा।