Highlights:
राजकुमार भाटी की प्रतिज्ञाएं, मायावती की दुर्गा रूप में आरती
एक तरफ बौद्ध प्रतिज्ञाएं, दूसरी तरफ मायावती की पूजा
राजकुमार भाटी और आशुतोष पाठक की घटनाओं ने खड़े किए सवाल
2027 से पहले यूपी की राजनीति में धर्म और सामाजिक न्याय के प्रतीकों पर चर्चा तेज
Mayawati Goddess Portrayal In Viral Video: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आस्था अब सिर्फ निजी मामला नहीं रह गई है। यह चुनावी हथियार, प्रतीक और विरोधाभास का खेल बन चुकी है। एक तरफ वायरल वीडियो में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी दिल्ली के अंबेडकर भवन में डॉ. आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएं दोहराते हुए ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और कृष्ण को भगवान न मानने तथा उनकी पूजा न करने की शपथ लेते नजर आते हैं। दूसरी तरफ आशुतोष पाठक लखनऊ के 1090 चौराहे पर मायावती को आठ भुजाओं वाली दुर्गा का रूप देकर आरती उतार रहे हैं, शंख फूंक रहे हैं और अब बनारस से गंगाजल लाकर उसी स्थान पर पहुंचाने का संकल्प ले रहे हैं।
18 अक्टूबर को आशुतोष पाठक ने मायावती की तस्वीर को अष्टभुजा देवी के रूप में सजाया। हाथों में संविधान, मीडिया, न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा, किसान, उद्योग और सामाजिक न्याय के प्रतीक थमाए। खुद को “मैया का पुजारी” बताया और पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लिया। अब 27 अक्टूबर को संत रविदास घाट पर गंगा पूजन कर उसी 1090 चौराहे तक गंगाजल ले जाने का ऐलान है।
ठीक दो दिन बाद 20 अक्टूबर को राजकुमार भाटी बौद्ध धम्म दीक्षा समारोह में मुख्य अतिथि बने और आंबेडकर की प्रतिज्ञाओं के साथ हिंदू देवी-देवताओं को न मानने की शपथ दोहराते दिखे। वीडियो वायरल हुआ तो सफाई आई कि धर्म परिवर्तन नहीं किया, सिर्फ कार्यक्रम में शामिल हुए। पार्टी के अंदर से भी चेतावनी आई।
एक तरफ हिंदू देवताओं को नकारने का सार्वजनिक प्रदर्शन, दूसरी तरफ राजनीतिक नेता को देवी बनाकर पूजा अर्चना। दोनों घटनाएं व्यक्तिगत आस्था का दावा करती हैं, लेकिन दोनों ही राजनीतिक संदेश बनकर सामने आईं।
एक तरफ “भगवान नहीं मानूंगा” की शपथ दूसरी तरफ “मैया मायावती” की आरती। एक तरफ बौद्ध प्रतिज्ञाएं, दूसरी तरफ गंगाजल यात्रा। दोनों तरफ “सामाजिक न्याय” और “बहुजन” का नारा, लेकिन तरीका एकदम उलटा।
राजनीति में आस्था का इस्तेमाल नया नहीं है। लेकिन जब एक ही राज्य में, एक ही हफ्ते में दो विपरीत दृश्य सामने आएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है क्या आस्था अब सिर्फ चुनावी प्रतीक रह गई है? क्या भगवान को नकारना भी राजनीतिक स्टैंड है और नेता को भगवान बनाना भी?
2027 के चुनाव करीब हैं। ऐसे में ये घटनाएं याद दिलाती हैं कि यूपी की राजनीति अभी भी प्रतीकों, भावनाओं और विरोधाभासों पर काफी हद तक टिकी हुई है। एक तरफ शपथ, दूसरी तरफ आरती। बीच में सिर्फ सत्ता की चाहत।
रिपोर्ट- इशांक दीक्षित