इलाहाबाद हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
प्रयागराज

हाईकोर्ट ने राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति पर की अहम टिप्पणी, कहा- मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं हो सकती

Prisoner Premature Release UP: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई के मामले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की सजा में छूट की शक्ति का मनमाना इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

ओमप्रकाश सिंह परिहार, स्निग्धा श्रीवास्तव

Allahabad High Court Premature Release: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को मिली सजा में छूट की शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।

संवैधानिक शक्ति का प्रयोग उपलब्ध रिकॉर्ड, सही तथ्यों और निर्धारित नियमों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि गलत तथ्यों या अधूरे रिकॉर्ड के आधार पर किसी कैदी की समय से पहले रिहाई की अर्जी पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।

नए सिरे से विचार करने का निर्देश

यह फैसला न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राम प्रताप सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। कोर्ट ने समय से पहले रिहाई की अर्जी को खारिज करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही 26 जून 2025 को पारित आदेश को भी रद्द करते हुए सरकार को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।

तथ्यों की सही जानकारी होना बेहद जरूरी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान जेल में बिताई गई अवधि को गलत दर्ज किए जाने पर गंभीर नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कैदी की समय से पहले रिहाई जैसे महत्वपूर्ण मामले में उसके कारावास की वास्तविक अवधि और अन्य प्रासंगिक तथ्यों की सही जानकारी होना बेहद जरूरी है। रिकॉर्ड में तथ्यात्मक गलती होने पर उस आधार पर लिया गया निर्णय भी टिकाऊ नहीं माना जा सकता।

रिहाई की अर्जी पर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश

हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक महीने के भीतर याची की समय से पहले रिहाई की अर्जी पर नए सिरे से फैसला लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत व्यापक संवैधानिक शक्ति प्राप्त है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए।

संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल में नियमों का पालन अनिवार्य

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक शक्ति का अर्थ यह नहीं है कि उपलब्ध तथ्यों और रिकॉर्ड की अनदेखी कर निर्णय लिया जाए। संबंधित प्राधिकारी को मामले के सभी पहलुओं की जांच करनी होगी और सही तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा।

कोर्ट के इस फैसले को समय से पहले रिहाई के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि सजा में छूट या समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में प्रशासनिक स्तर पर तैयार किए जाने वाले रिकॉर्ड और तथ्यों की शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण होगी। साथ ही संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल में पारदर्शिता और निर्धारित नियमों के पालन को भी अनिवार्य माना गया है।

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