M Nageswara Rao Joins Politics: सरकारी सेवा में दशकों तक प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाने वाले अधिकारियों का राजनीति में उतरना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। हालांकि उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ समय में रिटायरमेंट या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के बाद पूर्व नौकरशाहों की राजनीतिक सक्रियता ने एक बार फिर इसे चर्चा में ला दिया है। हाल ही में पूर्व CBI निदेशक एम. नागेश्वर राव ने वाराणसी में अपनी सर्वजन सनातन पार्टी लॉन्च करते हुए सक्रिय राजनीति में कदम रखा दिया है।
करीब चार दशक तक पुलिस और जांच एजेंसियों में काम करने के बाद राजनीति में उनकी एंट्री इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे CBI के अंतरिम निदेशक की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनका राजनीतिक प्रवेश इस व्यापक चर्चा का हिस्सा बन गया है कि क्या अनुभवी नौकरशाह चुनावी राजनीति में अपनी प्रशासनिक पहचान और अनुभव को राजनीतिक पूंजी में बदल सकते हैं।
एम. नागेश्वर राव 1986 बैच के ओडिशा कैडर के IPS अधिकारी रहे हैं। पुलिस सेवा के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। तालचेर में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने कोयला तस्करी के खिलाफ कार्रवाई की। 1996 में जगतसिंहपुर में एक रेप केस की जांच में उन्होंने DNA फिंगरप्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे ओडिशा पुलिस में शुरुआती प्रयोगों में माना जाता है।
उनकी सबसे बड़ी पहचान चक्रवात फाइलिन और हुदहुद के दौरान आपदा प्रबंधन से बनी। फाइलिन के समय ओडिशा में करीब 10 लाख लोगों की सुरक्षित निकासी हुई। उनके काम के लिए उन्हें ओडिशा सरकार का पहला लोक सेवा में उत्कृष्टता और नवाचार के लिए मुख्यमंत्री पुरस्कार मिला। बाद में वे CBI के अंतरिम निदेशक भी बने।
CBI के अंतरिम निदेशक रहते हुए राव सबसे बड़े विवाद में तब फंसे, जब मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस की जांच कर रहे अधिकारी ए.के. शर्मा का तबादला कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही निर्देश दिया था कि जांच टीम के अधिकारियों को उसकी अनुमति के बिना ट्रांसफर न किया जाए। अदालत ने राव को अवमानना का दोषी माना और ₹1 लाख जुर्माना लगाया। उन्हें कोर्ट उठने तक एक कोने में बैठने की सजा भी दी गई।
2017 से अब तक उत्तर प्रदेश कैडर के 9 IAS अधिकारियों ने VRS लिया, जबकि 4 अधिकारियों ने इस्तीफा दिया। इस तरह कुल 13 IAS अधिकारी नियमित सेवानिवृत्ति से पहले सेवा से बाहर हुए हैं। इन अधिकारियों में आर.पी. सिंह, राजीव अग्रवाल, मोहम्मद मुस्तफा, आमोद कुमार, रेणुका कुमार, जूथिका पाटणकर, विकास गोठलवाल, रिग्जियान सैंफिल और अनामिका सिंह जैसे नाम शामिल हैं।
हाल के मामलों में कुछ पूर्व अधिकारियों की राजनीतिक सक्रियता ने इस चर्चा को नया आधार दिया है। पूर्व IAS दिव्या मित्तल ने 2026 में IAS सेवा से इस्तीफा देने के बाद राजनीति में आने की घोषणा की। हालांकि उन्होंने अभी तक यह नहीं बताया कि है कि वह खुद की पार्टी बनाएंगी या फिर किसी और पार्टी का दामन थामेंगी। दिव्या के इस्तीफे के पीछे योगी सरकार से नाराजगी को भी एक महत्वपूर्ण कारण माना गया।
यूपी कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने आरोप लगाया था कि दिव्या मित्तल को फील्ड से हटाकर राजस्व विभाग में तैनात किया गया और इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में 2017 के बाद अब तक 13 आईएएस अधिकारियों ने इस्तीफा दिया या वीआरएस लिया है। हालांकि दिव्या मित्तल ने अपने इस्तीफे को लेकर अभी तक खुद यह नहीं कहा कि वह सरकार ने नाराज हैं।
इसी तरह पूर्व IAS राकेश वर्मा ने भी 22 साल तक प्रशासनिक सेवा करने के बाद 2020 में शैक्षिक सेवानिवृत्ति लिया था। 1997 में PCS अधिकारी के तौर पर अपना सफर शुरू करने वाले राकेश वर्मा को 2013 में प्रमोट कर IAS बनाया गया था। उन्होंने भी VRS के बाद कांग्रेस का दामन थाम लिया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस यूपी में उन पर बड़ा दांव लगा सकती है। अब CBI के पूर्व निदेशक एम. नागेश्वर राव ने भी राजनीति में एंट्री कर ली है।
अधिकारियों के सेवा छोड़ने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। कुछ अधिकारी राजनीति में आने के लिए अपनी प्रशासनिक नौकरी छोड़ते हैं, कुछ सार्वजनिक जीवन में नई भूमिका तलाशते हैं और कुछ व्यक्तिगत कारणों से VRS लेते हैं। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि VRS या इस्तीफे देने वाले अधिकारी सरकार से नाराज हैं। जब तक वह खुद ऐसा कोई खुलासा या बयान न दें।
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ पूर्व नौकरशाहों की राजनीतिक भूमिका पर नजर रहना स्वाभाविक है। प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारियों के पास शासन, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रत्यक्ष समझ होती है। लेकिन इस अनुभव को चुनावी समर्थन में बदलना अलग चुनौती है।
उत्तर प्रदेश में नौकरशाही से राजनीति की ओर आने वाले चेहरों की चर्चा जरूर तेज हुई है, लेकिन इसे फिलहाल किसी एक राजनीतिक धड़े के खिलाफ सामूहिक असंतोष के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। आने वाले महीनों में VRS लेने वाले अधिकारियों की राजनीतिक सक्रियता, उनके सार्वजनिक बयान और 2027 के चुनाव में उनकी भूमिका इस बदलते ट्रेंड की वास्तविक तस्वीर ज्यादा स्पष्ट कर सकती है।