कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन) 
उत्तर प्रदेश

यूपी BJP को क्यों नहीं मिल रहा नया अध्यक्ष? मिल गया देरी का सबसे बड़ा कारण!

सियासी दृष्टि से देश के सबसे बड़े सूबे यानी उत्तर प्रदेश में देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी अब भी अपने अगले प्रदेश अध्यक्ष को ढूंढने की कवायद में जुटी हुई है।

अभिषेक सिंह

लखनऊ: भाजपा ने सोमवार से बुधवार तक 9 राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों की घोषणा कर दी है। इन राज्यों में उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, बिहार शामिल हैं जो यूपी से सटे हैं, लेकिन राजनैतिक दृष्टि से देश के सबसे बड़े सूबे में बीजेपी अब भी अपने अगले प्रदेश अध्यक्ष को ढूंढने की कवायद में जुटी हुई है। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है, लेकिन उनके प्रतिस्थापन का अभी भी इंतजार है।

चर्चा यह भी है कि उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष तय होने के बाद ही जेपी नड्डा के प्रतिस्थापन पर मुहर लगेगी। फिर भी अगर पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने प्रमुख का नाम तय नहीं कर पा रही है, तो इसके कुछ कारण हैं। पहला कारण यह है कि सामाजिक समीकरण साधने के लिए मंथन चल रहा है।

कैसा प्रदेश अध्यक्ष चाह रही है पार्टी

इसके अलावा एक ऐसे नेता की भी तलाश है जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के साथ-साथ केंद्र से भी समन्वय स्थापित कर सके। ऐसे में एक संतुलित नेता की जरूरत है और उसे तलाशने के लिए मंथन चल रहा है। फिलहाल कई नाम चर्चा में हैं, जिनके सहारे भाजपा नरम ध्रुवीकरण की संभावना बनाना चाहेगी।

चर्चा में धर्मपाल सिंह लोधी का नाम

प्रदेश अध्यक्ष के लिए चर्चाओं में एक नाम धर्मपाल सिंह लोधी का भी है। वह लोधी समुदाय से आते हैं और गैर यादव ओबीसी समुदाय को साथ लाने के प्रयासों के तहत भाजपा लंबे समय से इस समुदाय को आगे बढ़ा रही है। दिवंगत कल्याण सिंह की गिनती लोधी समुदाय के बड़े नेताओं में होती थी।

लोधी चेहरे से किसे हो सकती है दिक्कत?

धर्मपाल सिंह लोधी साफ-सुथरी छवि वाले नेता हैं, लेकिन राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें आगे बढ़ाने से राजवीर सिंह को परेशानी हो सकती है। वह कल्याण सिंह के बेटे हैं और उनकी राजनीतिक विरासत के दावेदार भी रहे हैं।

स्वतंत्र देव सिंह भी रेस में शामिल

एक और नाम चर्चा में है, वह स्वतंत्र देव सिंह हैं। वह पहले प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और सीएम योगी आदित्यनाथ के करीबी भी रहे हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो संतुलन के लिहाज से वह एक विकल्प हो सकते हैं। वह भी पिछड़े समुदाय से आते हैं।

उत्तर प्रदेश में क्यों हो रहा विलंब?

दरअसल, समाजवादी पार्टी की ओर से लगातार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा दोहराया जा रहा है। ऐसे में भाजपा नहीं चाहती कि सामाजिक समीकरण साधने में कोई कसर रह जाए। क्योंकि जो भी नया अध्यक्ष बनेगा उसी के नेतृत्व में 2027 का चुनाव लड़ा जाएगा।

दलित नेताओं में यह नाम आगे

चर्चा यह भी है कि किसी दलित नेता को ही मौका दिया जाएगा। इन नेताओं में रामशंकर कठेरिया की भी चर्चा है। खास बात यह है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के लिए एक ही नेता को नामित करेगी और फिर उसकी घोषणा की जाएगी। ऐसा करने से यह संदेश जाएगा कि सर्वसम्मति से नेता का चयन किया गया है।

देरी के पीछे यही मुख्य कारण माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि उस एक नाम को चुनने से पहले मंथन चल रहा है। पार्टी ऐसा नेता चाहती है जो इतने बड़े राज्य के हर क्षेत्र को संभाल सके। इसके अलावा सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी सकारात्मक संदेश जाए।

भाग जाओ पाकिस्तान...अखिलेश यादव ने बताया BJP का नया मतलब, PDA पर CM योगी के बयान पर किया पलटवार

रेवंत रेड्डी की अमेरिका यात्रा पर केंद्र की रोक! जेडी वेंस और जोहरान ममदानी से मुलाकात बनी वजह?

आज की ताजा खबर 22 अगस्त LIVE: पटना में PhD छात्रों का विरोध प्रदर्शन; दिल्ली में बीजेपी की आज तीन अहम बैठकें

युवा वोटर्स पर BJP की नजर, नई टीम की पहली बैठक में आउटरीच रणनीति पर चर्चा, पीएम मोदी होंगे शामिल

राहुल vs NDA: गिरिराज सिंह समेत BJP नेताओं ने राहुल को घेरा, बोले- सोनिया गांधी ने 15 साल नहीं ली नागरिकता