Uttar Pradesh NHM Contract Employees: उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के संविदा कर्मचारियों की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाओं पर असर दिखाई देने लगा है। समान कार्य-समान वेतन, नियमितीकरण और संवर्ग गठन समेत विभिन्न मांगों को लेकर 8 से 10 अक्टूबर तक चल रहे तीन दिवसीय कार्य बहिष्कार के बीच आगरा में स्वास्थ्य कर्मियों ने मोर्चा खोल दिया है। शहर से लेकर देहात तक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर आंदोलन का असर पड़ रहा है। जिला अस्पताल से लेकर सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभावित होने की आशंका के बीच मरीजों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।
शुक्रवार को आगरा जनपद के NHM से जुड़े डॉक्टर, फार्मासिस्ट और अन्य कर्मचारी मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) कार्यालय पहुंचे। यहां कर्मचारियों ने अपनी मांगों के समर्थन में जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वर्षों से संविदा पर सेवाएं देने के बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों के समान सुविधाएं और वेतन नहीं मिल रहा है। अब आश्वासन नहीं, बल्कि मांगों पर ठोस निर्णय चाहिए।
NHM कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांग समान कार्य के लिए समान वेतन लागू करने की है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे नियमित कर्मचारियों की तरह ही स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी संभालते हैं, लेकिन उनके मानदेय और सेवा संबंधी सुविधाओं में बड़ा अंतर है। कम मानदेय में परिवार का भरण-पोषण करना भी मुश्किल हो रहा है। कर्मचारियों ने नियमितीकरण और अपने पदों के लिए अलग संवर्ग बनाए जाने की मांग भी दोहराई।
कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार के साथ पूर्व में कई मांगों पर लिखित सहमति बनी थी। नियमित भर्ती में अतिरिक्त अंक देने जैसे बिंदु भी उस सहमति में शामिल बताए जाते हैं, लेकिन लंबे समय बाद भी उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हुआ। इसी वजह से कर्मचारियों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
प्रदर्शन के दौरान बाल योगी भी NHM कर्मचारियों के समर्थन में पहुंचे। उन्होंने कहा कि संविदा कर्मचारियों का शोषण केवल मौजूदा सरकार के कार्यकाल तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले 40 से 50 वर्षों से यह समस्या बनी हुई है।
उनका कहना था कि संविदा पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मी नियमित कर्मचारियों के बराबर जिम्मेदारियां निभाते हैं, इसके बावजूद उन्हें पर्याप्त वेतन और स्थायित्व नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कर्मचारियों की मांगों को गंभीरता से लेने और उनके साथ न्याय करने की जरूरत पर जोर दिया।
प्रदर्शन में शामिल डॉ.मंजू सागर ने नव भारत से विशेष बातचीत में कहा कि कर्मचारी लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। उन्होंने कहा, “हमें काम करते हुए 20 साल हो गए, लेकिन आज तक नियमित नहीं किया गया। हम नियमित चिकित्सकों के बराबर काम करते हैं, फिर भी हमारे साथ वेतन और सेवा संबंधी मामलों में भेदभाव किया जा रहा है।”
चिकित्सक ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर सुनवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कर्मचारी लखनऊ में प्रदेशव्यापी प्रदर्शन करेंगे और मांगें पूरी होने तक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर भूख हड़ताल करने की बात भी कही गई।
NHM कर्मचारियों ने आंदोलन के अगले चरण के तहत 12 अक्टूबर को लखनऊ के ईको गार्डन में प्रदेशव्यापी धरना-प्रदर्शन की तैयारी की है। कर्मचारी संगठनों के अनुसार, इसमें प्रदेशभर से बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों के शामिल होने की संभावना है। आंदोलन से पहले 5 से 7 अक्टूबर तक कर्मचारियों ने बांह पर काली पट्टी बांधकर विरोध जताया था। इसके बाद 8 से 10 अक्टूबर तक आपातकालीन सेवाओं को छोड़कर कार्य बहिष्कार किया जा रहा है।
इस आंदोलन में डॉक्टर, स्टाफ नर्स, एएनएम, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और कंप्यूटर ऑपरेटर समेत NHM से जुड़े विभिन्न संविदा कर्मचारी शामिल हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में NHM कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होने के कारण कार्य बहिष्कार का असर मरीजों की जांच, ओपीडी और अन्य गैर-आपातकालीन सेवाओं पर पड़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी सेवाएं प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि, वास्तविक असर संबंधित केंद्रों पर उपलब्ध नियमित कर्मचारियों और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।
जिला अस्पताल में भी NHM कर्मियों की हड़ताल का असर देखने को मिला। डॉक्टर कर्मचारी फार्मासिस्ट सभी के सभी कार्य से नदारत दिखाई दिए, जिला अस्पताल कमरा नंबर 13, 14 और 15 खाली पड़े हुए थे जब मरीज लगातार पहुंचते रहे।
अब निगाहें सरकार और स्वास्थ्य विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं। एक ओर कर्मचारी वर्षों से लंबित मांगों को पूरा कराने के लिए आंदोलन तेज करने की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु बनाए रखना प्रशासन के सामने चुनौती है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो इस आंदोलन का दायरा और बढ़ सकता है।