Nepal Flood Tragedy 2026: नेपाल... प्रकृति की खूबसूरती से सजा वह देश, जहां चारों तरफ पहाड़, हरियाली, नदियां और झरने दिखाई देते हैं। लेकिन जब इंसान प्रकृति से छेड़छाड़ करता है, उसके संसाधनों का बेतहाशा दोहन करता है तो कभी-कभी प्रकृति भी अपना रौद्र रूप दिखाती है। उत्तराखंड में वर्ष 2013 की त्रासदी इसका भयावह उदाहरण रही है। हजारों लोग बेघर हुए, सैकड़ों जिंदगियां काल के गाल में समा गईं और कई गांव बाढ़ की लहरों में बह गए। अब नेपाल में भी कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिला है।
26 अगस्त की सुबह नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने और हिमस्खलन के बाद त्रिशूली और भोटे कोसी नदियों में अचानक भीषण फ्लैश फ्लड आ गई। पहाड़ों से उतरी पानी की तेज धार ने लोगों को संभलने तक का मौका नहीं दिया। देखते ही देखते घर, सामान और लोगों की उम्मीदें पानी के सैलाब में बहती चली गईं। कहीं अपनों की तलाश है तो कहीं मलबे में जिंदगी तलाशने की कोशिश। नेपाल में तबाही के बाद राहत और बचाव अभियान जारी है। बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं और कई परिवार अपनों की वापसी का इंतजार कर रहे हैं।
नेपाल की इस त्रासदी का दर्द आगरा तक पहुंचा है। आगरा की एक प्रसिद्ध क्रिकेट अकादमी में प्रशिक्षण ले रहा युवा क्रिकेटर मोहन इस समय मैदान में जरूर है, लेकिन उसका मन नेपाल में अपने परिवार और रिश्तेदारों के बीच अटका हुआ है।
मोहन की आंखों में आंसू हैं, गला रुंधा हुआ है और बातचीत करते-करते उसकी आवाज भर आती है। नेपाल में आई तबाही में उसके कई रिश्तेदार प्रभावित हुए हैं। परिवार से लगातार संपर्क की कोशिश हो रही है, लेकिन मोबाइल पर आने वाली हर खबर उसके भीतर बेचैनी पैदा कर देती है। वह बताता है कि आंखें बंद करते ही बाढ़ का वही भयावह मंजर सामने आ जाता है। नींद गायब है और मन बार-बार अपनों की चिंता में डूब जाता है।
हजारों किलोमीटर दूर आगरा में क्रिकेट का प्रशिक्षण ले रहा मोहन कहता है कि उसका शरीर भले आगरा में है, लेकिन उसकी आत्मा नेपाल में ही है। उसका सपना है कि वह नेपाल की ओर से क्रिकेट की दुनिया में अपने देश का प्रतिनिधित्व करे और अपनी अलग पहचान बनाए। मगर इस समय क्रिकेट से भी बड़ा उसके सामने अपने परिवार और अपनों की सलामती का सवाल खड़ा है।
मोहन के कोच केके शर्मा बताते हैं कि नेपाल की त्रासदी ने इस युवा खिलाड़ी को भीतर तक हिला दिया है। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी होने के नाते वह मोहन के दर्द को समझने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जिस व्यक्ति के अपने लोग इस त्रासदी से जूझ रहे हों, उसके भीतर का दर्द कोई दूसरा पूरी तरह नहीं समझ सकता।
रेलवे क्रिकेट टीम के पूर्व चयनकर्ता और खिलाड़ी रहे के के शर्मा ने नव भारत को बताया कि, त्रासदी की खबरों के बाद मोहन ने दो-तीन दिन तक ठीक से खाना तक नहीं खाया। उसका ध्यान लगातार नेपाल में फंसे अपनों पर लगा रहा। ऐसे में कोच ने उसे क्रिकेट में व्यस्त रखना शुरू किया, ताकि उसका ध्यान कुछ समय के लिए इस भयावह घटना से हट सके।
मंगलवार को इसी मानसिक दबाव के बीच मोहन ने प्रशिक्षण के दौरान शतक जड़ दिया। यह शतक महज क्रिकेट के आंकड़ों में दर्ज होने वाली पारी नहीं थी, बल्कि उसके लिए दर्द के खिलाफ संघर्ष की एक छोटी-सी जीत भी थी।
केके शर्मा कहते हैं कि क्रिकेट के मैदान का दबाव अलग होता है और प्रकृति द्वारा दिया गया दर्द अलग। खिलाड़ी को खेल में वापस लाना उनकी जिम्मेदारी है, लेकिन मोहन के दिल में जो दर्द है, उसे वही जानता है। उन्होंने मोहन के परिजनों को भी भरोसा दिया है कि वे चिंता न करें। मोहन की कोचिंग, भोजन और जरूरतों का खर्च वह स्वयं उठाएंगे और उसे निशुल्क प्रशिक्षण देते रहेंगे।
नेपाल में राहत और बचाव एजेंसियां प्रभावित इलाकों में लोगों को सुरक्षित निकालने और राहत पहुंचाने में जुटी हैं। कई परिवार अपने लापता परिजनों की तलाश कर रहे हैं। किसी को उम्मीद है कि मलबे के बीच से उनका अपना मिल जाएगा तो कोई अपनों की एक खबर के लिए बेचैन है।
मोहन भी इसी इंतजार में है। वह आगरा की क्रिकेट पिच पर अपनी बल्लेबाजी को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हर गेंद के पीछे कहीं न कहीं नेपाल की तस्वीरें दिखाई देती हैं।
नेपाल की त्रासदी ने हजारों परिवारों को ऐसा दर्द दिया है, जिसे भूलने में शायद वर्षों लगेंगे। मोहन के लिए भी यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि उसके अपने लोगों से जुड़ा हुआ जख्म है। क्रिकेट शायद उसके मन का दर्द पूरी तरह खत्म न कर पाए, लेकिन उसके कोच की कोशिश है कि बल्ला थामे यह युवा खिलाड़ी धीरे-धीरे उस दर्द से बाहर निकले और एक दिन नेपाल की जर्सी पहनकर अपने देश का नाम रोशन करे।