बढ़ती लागत के बावजूद दीपक बनाने वाले कारीगरों को नहीं मिल रहा उचित मेहनताना।
योजनाओं के तहत मिलने वाले चाक बाजार में बेचे जाने की शिकायत।
कुम्हारों ने सरकार से आर्थिक मदद और योजनाओं का लाभ दिलाने की मांग की।
Prajapati Community Financial Crisis: दीपावली का पर्व नजदीक आते ही देशभर में रौनक दिखाई देने लगी है। बाजारों में दीपकों और सजावटी सामान की खरीदारी तेज हो गई है। हर साल की तरह इस बार भी अयोध्या लाखों दीपकों से जगमगाने की तैयारी में है। इस आयोजन के लिए आगरा से भी बड़ी संख्या में मिट्टी के दीपक अयोध्या भेजे जाते रहे हैं, लेकिन इस बार कुम्हारों को पहले की तुलना में कम काम मिल रहा है। अयोध्या से मिलने वाले दीपकों के ऑर्डर में आई कमी और लगातार बढ़ती लागत ने प्रजापति समाज के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।
दूसरों के घरों और धार्मिक स्थलों को अपने हाथों से बनाए दीपकों से रोशन करने वाला प्रजापति समाज आज खुद आर्थिक तंगी के अंधेरे से गुजर रहा है। मिट्टी के दीपक बनाने वाले परिवारों का कहना है कि सरकार की तमाम योजनाएं संचालित होने के बावजूद उनका लाभ जरूरतमंद कारीगरों तक नहीं पहुंच पा रहा है। नवभारत से विशेष बातचीत में समाज के लोगों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि हम दुनिया भर के लोगों के घरों को रोशन करते हैं, लेकिन हमारे अपने घरों में लंबे समय से अंधेरा छाया हुआ है।
प्रजापति समाज के रमेश चंद्र ने बताया कि अयोध्या में दीपोत्सव के लिए पहले बड़ी संख्या में दीपकों के ऑर्डर मिलते थे। इससे कारीगरों को अच्छा काम मिलता था और उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार होता था। हालांकि, अब अयोध्या से दीपकों की मांग काफी सीमित रह गई है। आगरा और आसपास के क्षेत्रों से मांग जरूर आ रही है, लेकिन मिट्टी की लगातार बढ़ती कीमत और उपलों की कमी के कारण दीपक तैयार करना भी महंगा पड़ रहा है। लागत बढ़ने के बावजूद कारीगरों को मेहनत के मुताबिक आमदनी नहीं हो पा रही है। उन्होंने बताया कि 6 हजार रूपये ट्राली मिट्टी का रेट चल रहा है, ऐसे में हम किससे उम्मीद करें।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में मिट्टी के दीपक और अन्य पारंपरिक मिट्टी के उत्पाद बनाने वाले कारीगर दिखाई देना बंद हो जाएंगे। लगातार आर्थिक संकट के चलते युवा पीढ़ी इस परंपरागत पेशे से दूरी बना रही है। समाज के युवा अब चांदी, जूते और दूसरे कारोबारों में रोजगार तलाश रहे हैं। उनका मानना है कि इन कामों में मेहनत के मुकाबले बेहतर आमदनी मिल रही है, जबकि मिट्टी के बर्तन और दीपक बनाने के कारोबार में परिवार का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया है।
वहीं, मिस्सी और मानक चंद्र प्रजापति ने बताया कि महंगाई की मार से प्रजापति समाज के परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन समाज के वास्तविक जरूरतमंद लोगों को उनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। उनका कहना है कि दूसरे लोग सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं, जबकि परंपरागत रूप से मिट्टी के उत्पाद बनाने वाले कारीगर आर्थिक सहायता से वंचित हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले चाक को प्राप्त करने के बाद चाक बाजार में बेच देते हैं। इसके चलते वास्तविक जरूरतमंद कारीगरों तक सरकारी सहायता नहीं पहुंच पाती। समाज के लोगों ने मांग की है कि योजनाओं का लाभ पात्र प्रजापति परिवारों तक पारदर्शी तरीके से पहुंचाया जाए और उन्हें आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया जाए।
प्रजापति समाज के लोगों का कहना है कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि पारंपरिक पेशे को छोड़कर दूसरे कारोबार की ओर रुख करने के बारे में सोचना पड़ रहा है। यदि समय रहते सरकार ने मिट्टी के दीपक और बर्तन बनाने वाले कारीगरों की सुध नहीं ली तो आने वाली पीढ़ी इस पुश्तैनी काम से पूरी तरह दूर हो जाएगी। दीपावली पर लाखों घरों को रोशन करने वाले इन कारीगरों की चिंता अब यही है कि उनके अपने घरों का चूल्हा कैसे जलेगा।