UPI MDR Impact on Payments: भारत ने पिछले एक दशक में दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल क्रांति यूपीआई के रूप में देखी है। एक ऐसी तकनीक जिसने देश के सबसे गरीब रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर बड़े-बड़े मॉल तक, और एक आम वेतनभोगी से लेकर युवाओं तक की आदत को पूरी तरह बदल दिया।
लोग बटुआ घर छोड़कर सिर्फ स्मार्टफोन लेकर निकलने लगे लेकिन 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहे MDR (मर्चेट डिस्काउंट रेट) के नए नियमों ने देश के इस सबसे सफल डिजिटल ढांचे और आम जनता के भरोसे की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है।
बाजार में एक गहरा अविश्वास फैल रहा है। सरकारी मीडिया पर जो सफाइयां पेश की जा रही हैं, वे जमीनी हकीकत से कोसों दूर और हास्यास्पद हैं। नीति-निर्माताओं को इन कड़वे सच और संभावित खतरों को तुरंत समझना होगा।
सरकारी चैनलों पर बताया जा रहा है कि यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने का खर्च बहुत अधिक है, लेकिन यह क्यों छिपाया जा रहा है कि सरकार की अपनी जेब में यह पैसा कहाँ से आता है? यह पैसा देश की इसी आम जनता और मध्यम वर्ग के इनकम टैक्स और जीएसटी से आता है।
जब जनता पहले से ही टैक्स दे रही है, तो डिजिटल भुगतान जैसी बुनियादी सेवा को मुफ्त बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। यूपीआई के आने से फिजिकल कैश का सर्कुलेशन बहुत कम हुआ है। आरबीआई को हर साल हजारों करोड़ रुपये नए नोट छापने, सिक्कों की ढलाई करने, फटे नोटों को नष्ट करने और सुरक्षित कैश वैन चलाने में खर्च करने पड़ते थे।
इस डिजिटल क्रांति ने सरकार के इस सालाना खर्च में जो हजारों करोड़ रुपये की सीधी बचत कराई है, उसका एक हिस्सा इस तकनीक को मुफ्त रखने में क्यों इस्तेमाल नहीं किया जा सकता? डिजिटल पेमेंट की पारदर्शिता के कारण आज भारत का असंगठित बाजार संगठित हो रहा है।
यही वजह है कि सरकार का जीएसटी कलेक्शन हर महीने 2 लाख करोड़ के ऐतिहासिक स्तर को छू रहा है। जो तकनीक सरकार को सबसे ज्यादा अमीर बना रही है, उसी के संचालन के नाम पर अब व्यापारियों और अप्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों पर बोझ डालना एक प्रकार का आर्थिक विरोधाभास है।
भारत का उपभोक्ता और व्यापारी बेहद समझदार है। यदि व्यापारियों ने MDR से बचने के लिए ग्राहकों को 'कैश डिस्काउंट' ऑफर करना शुरू कर दिया, तो ग्राहक शिकायत करने नहीं जाएगा, वह खुशी-खुशी नकद भुगतान कर देगा। व्यापारी 2000 से कम के छोटे और विभाजित बिल बनाएंगे। इससे भी बड़ा खतरा बैंकिंग सिस्टम पर है। वह वेतनभोगी मध्यम वर्ग जो अपनी सैलरी बैंक खातों में सुरक्षित रखकर डिजिटल खर्च करता था, वह असुरक्षा और अविश्वास के कारण महीने के पहले ही हफ्ते में बैंक से अपना पूरा पैसा नकद निकालकर घर में रख लेगा।
इससे बैंकों में नकदी का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। बैंकों के पास लोन देने के लिए पैसा नहीं बचेगा, जिससे ब्याज दरें महंगी हो जाएंगी। देश एक बार फिर 100% कैश इकोनॉमी और ब्लैक मनी के पुराने दौर में लौट जाएगा। एकमात्र समाधान यह है कि इस फैसले को पूरी तरह खारिज किया जाए, यह फैसला सरकार के अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा साबित होगा। इससे जनता में भारी जनाक्रोश पैदा हो सकता है जो सरकार की साख को शून्य कर देगा।
देश और सरकार दोनों के हित में एकमात्र उपाय यही है कि यूपीआई को 'पब्लिक यूटिलिटी' (अनिवार्य सरकारी सेवा) घोषित किया जाए और इस पर कभी कोई चार्ज न लगाया जाए। यह तथ्य भी अपनी जगह है कि पिछले सिर्फ 9 महीनों में यूपीआई 200 बिलियन (अरब) ट्रांजेक्शन पार कर चुका है।
वित्त वर्ष 2026 में जनवरी से सितंबर तक डिजिटल पेमेंट नेटवर्क ने 205.24 अरब ट्रांजेक्शन प्रोसेस किए, सरकार को ऐसा नहीं लगता कि 15 अक्टूबर से एमडीआर लागू करने के बाद यूपीआई ट्रांजेक्शन में कोई कमी आएगी। डिजिटल पेमेंट करना लोगों की आदत बन चुकी है। यह त्योहारों की बड़ी खरीदारी के दौरान सुविधाजनक भी रहेगा क्योंकि लोग शॉपिंग के लिए कैश ले जाना पसंद नहीं करते। एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपए रहेगी।
लेख-कृष्णानंद शुक्ला के द्वारा