भीमाशंकर-कर्जत में टोरेंट पावर की जलविद्युत परियोजना का पर्यावरण समर्थकों ने विरोध किया।
परियोजना के लिए 32,000 से अधिक पुराने पेड़ काटे जाने की आशंका है।
फडणवीस सरकार का दावा है कि 90,000 नए पेड़ लगाए जाएंगे।
सवाल है कि क्या नए पौधे पुराने जंगल और जैव विविधता की भरपाई कर पाएंगे?
Hydropower Project Forest and Biodiversity Impact: विकास के नाम पर पर्यावरण या प्रकृति से खिलवाड़ कदापि उचित नहीं है। महाराष्ट्र के रायगड़ जिले के भीमाशंकर कर्जत परिसर में प्रस्तावित टोरेंट पावर के जलविद्युत प्रकल्प को लेकर पर्यावरण समर्थकों ने आपत्ति उठाई है। इस परियोजना के लिए 32,000 से अधिक पुराने वृक्षों और वनभूमि की बलि चढ़ा दी जाएगी। सरकार का कहना है कि 13,500 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला 3,000 मेगावाट क्षमता का हरित ऊर्जा देने वाला यह जलविद्युत प्रकल्प राज्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जरूरी है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस परियोजना का समर्थन करते हुए कहा कि इसे लेकर डेढ़ वर्ष में सभी वैधानिक व प्रशासकीय प्रक्रिया पूर्ण की जा चुकी है तथा इसकी व्यर्थ ही भ्रामक आलोचना की जा रही है। परियोजना स्थल व अन्य ठिकानों पर 90,000 नए वृक्ष लगाए जाएंगे। सरकार के इस दावे के बावजूद प्रश्न उठता है कि क्या पुराने वृक्षों का स्थान नए पौधे ले सकते हैं? उनके बढ़ने में अनेक वर्ष लग जाएंगे और पता नहीं, उनमें से कितने पनपेंगे? वन का अर्थ केवल वृक्षों की संख्या नहीं है। वह जैव विविधता का स्थान होता है।
वनों के जरिए वर्षा का पानी जमीन में समाता है। वन तापमान को नियंत्रित करता है और असंख्य जीवों को आश्रय देता है। इसलिए वृक्षों को काटने के बाद नए पौधों का रोपण करने से नुकसान भरपाई नहीं हो सकती। कर्जत व सह्याद्रि परिसर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील है। यहां जंगल, जलस्त्रोत और जैव विविधता का विचार केवल एक परियोजना के लिए ठुकराया नहीं जा सकता।
बड़े पैमाने पर वृक्ष कटाई का विपरीत परिणाम जल उपलब्धता, स्थानीय कृषि तथा ग्रामीणों की उपजीविका पर पड़े बिना नहीं रहेगा। इस संबंध में गंभीरता से विचार करना होगा। टोरेंट कंपनी का दावा है कि उसने पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद ही स्वच्छ ऊर्जा के अपने प्रकल्प के लिए वृक्षों की कटाई शुरू की है। दूसरी ओर कहा जा रहा है कि सरकार ने जानबूझकर नीतियों में शिथिलता बरती।
2014 के पूर्व यह प्रस्ताव सरकार के सामने आया था कि राज्य वन्यजीव मंडल इस बारे में विस्तार से चर्चा करे। इसके बाद मंडल के सदस्य स्थान का प्रत्यक्ष निरीक्षण करें। इसके उपरांत ही मंजूरी या नामंजूरी का फैसला किया जाए। अब तत्काल स्वीकृति देने का दबाव डाला जाता है। वृक्षों की कटाई पर रोक का कानून पहले जैसा ही है लेकिन इसे लागू करने का तरीका बदला गया है। वैकल्पिक वृक्षारोपण करने की दलील दी जाती है।
चाहे भीमाशंकर हो या गड़चिरोली, वहां के वनों पर उद्योगपतियों की नजरें लगी हैं। वहां वन कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। कर्जत में जहां जलविद्युत प्रकल्प बनाने की योजना है वहां कातकरी आदिवासी रहते हैं? क्या उनकी राय ली गई? अपना रोजगार छोड़कर क्या वह जंगल बचाने की मांग करने आते? वह विरोध भी करते तो उनकी कौन सुनता ? वैकल्पिक वृक्षारोपण की सफलता संदिग्ध बनी रहती है। गड़चिरोली में वृक्षों की कटाई के बाद 3 करोड़ पेड़ लगाने की बात कही गई थी। उसका क्या हुआ? शहरी क्षेत्रों में वृक्ष कटाई का कठोर कानून वापस ले लिया गया।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा