Student Cases Bihar Protest: परीक्षाओं में जरूरी सुधार किए जाएंगे तथा प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। अभी इस समझौते को 3 दिन भी पूरे नहीं हुए कि लगता है केंद्र सरकार वायदे से मुकर रही है और उसके इशारे पर अलग-अलग राज्य सरकारें, छात्रों के साथ सख्त बर्ताव करने पर आमादा हो गई हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल खबरों के मुताबिक, बिहार में लगभग 700 छात्रों पर अलग-अलग तरह के चार्ज लगाए गए हैं जिन्हें अभी तक वापस नहीं लिया गया, जिसके विरोध में 26 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाली आइसा नेता नेहा बोरा ने पटना में छात्रों के साथ मिलने, प्रेस कॉन्फ्रेंस करने और सड़कों पर उतरकर विरोध जताने का निर्णय लिया है।
सरकार वायदा करने के बावजूद छात्रों के विरुद्ध कार्रवाई की योजना बना रही है। अगर ऐसा होगा तो न सिर्फ फिर से अराजक स्थिति पैदा होने की स्थितियां बन जाएंगी बल्कि केंद्र सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लग जाएगा।
यदि अब केंद्र सरकार या उसके किसी तरह से एक्शन न लेने पर राज्य सरकारें आंदोलनकारी छात्रों को परेशान करती हैं, उनके विरुद्ध मुकदमें दर्ज करती हैं, उनके साथ ही उनके मां-बाप को भी कई तरह की परेशानियों में डालती हैं, तो न केवल केंद्र बल्कि उसके फैसले पर अमल न करने वाली राज्य सरकारों की भी राजनीतिक साख दांव पर लग जाएगी।
अगर केंद्र सरकार अपने वायदे से मुकरती है, तो न केवल पहले से ज्यादा स्थिति खराब हो सकती है बल्कि अगली बार शायद ही किसी आश्वासन पर आंदोलनकारी विश्वास भी करें।
यह कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों की शायद राजनीतिक अपरिपक्वता ही थी कि उन्होंने सरकार के नुमाइंदों द्वारा किए गए मुंहजुबानी आश्वासन पर भरोसा कर लिया। राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने आशंका जताई थी कि शायद मुंहजुबानी वायदों से सरकार पीछे भी हट सकती है।
अभी तक सरकार की तरफ से किए गए वायदों का कोई लिखित स्वरूप सामने नहीं आया। सरकार का कोई एक्शन आंदोलनकारियों के विरुद्ध अगले 2-4 दिन में सामने आता है, तो यह बहुत खराब स्थिति होगी।
सबसे पहले तो युवाओं का सरकार पर से भरोसा उठ जाएगा और अगर वो दूसरी बार फिर किसी आक्रोश और आवेग के साथ एकत्र हुए तो उन्हें काबू कर पाना आसान नहीं होगा।
जिस तरह प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक हुए हैं, सरकारी भर्तियों में देरी और रोजगार सृजन में असफलता हाथ लगी है, उससे छात्रों में गुस्सा है। यदि सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी एक कसक और छिपी हुई हार के रूप में महसूस करने की कोशिश करेगी, तो बात बिगड़ जाएगी और सारे दूरगामी लक्ष्य अपनी नाक ऊंची करने की जद्दोजहद में सिमट जाएंगे।
सिर्फ छात्र और आम लोग ही सरकार के पीछे हटने से विचलित नहीं होंगे बल्कि विपक्ष भी इसे सरकार की वायदा खिलाफी के रूप में दर्ज करेगा। अगर केंद्र सरकार किसी वायदे को पूरा करने से मुकरती है, तो उसे तमाम ज्वलंत सवालों के जवाब देने होंगे।
बिना वर्दी और बिना नाम पट्टिका के छात्रों पर लाठी चार्ज करने वाले पुलिसकर्मी, पुलिसकर्मियों के डंडे जिनमें कीलें मौजूद थीं और आंदोलकारियों पर पैलेट गन से हमला, ये सब वो दबे हुए सवाल हैं, जो अगर अपनी पूरी ताकत से उभर आएं तो सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए बेहतर है कि जो समझौता हो चुका है, सरकार उससे न मुकरे।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चला छात्र आंदोलन केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का आंदोलन नहीं था। यह देश की परीक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और सरकार की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवालों का प्रतीक था।
इसलिए जब केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच 3 वायदों पर समझौता हुआ, तब आंदोलन खत्म करने की घोषणा की गई। सरकार द्वारा आंदोलनकारी छात्रों से किए गए 3 वायदे यह थे- तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा देंगे।आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और अन्य कानूनी मामलों को वापस लिया जाएगा तथा भविष्य में उन पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
लेख- वीना गौतम के द्वारा