Satwant Singh Punjab Election Candidate: पूवं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे केहरसिंह के बेटे सतवंत सिंह को अमृतपाल सिंह के अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपना पहला प्रत्याशी घोषित किया है। 1984 में इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों ने गोलियों से छलनी कर निर्मम हत्या कर दी थी।
तब से अब तक 4 दशक बीत चुके हैं, लेकिन हत्यारे के बेटे को जान-बूझकर उम्मीदवारी देना पुराने जख्म को कुरेदने के समान है। सतवंत सिंह पूर्व बैंक प्रबंधक हैं, जिन्हें बस्सी पठाना सीट से चुनाव में खड़ा किया जाएगा। वारिस पंजाब दे को अमृतपाल सिंह की लोकप्रियता का लाभ मिला है, जो खटूर साहिब सीट से सांसद हैं और 2023 से जेल में हैं।
अमृतपाल को खालिस्तान समर्थक माना जाता है। पहले वारिस पंजाब दे पर आरोप लगता रहा कि वह बलिदान देने वाले परिवारों की उपेक्षा कर रहा है। यह आलोचना मनदीप सिंह ने की थी जिसके भाई संदीप सिंह पर शिवसेना नेता सुधीर सूरी तथा पूर्व पुलिस अधिकारी सुबा सिंह की हत्या का आरोप है।
गत वर्ष मनदीप सिंह ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें वारिस पंजाब दे तथा शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) का समर्थन था। चुनाव में मनदीप सिंह की हार हुई थी। पंजाब में अकाली दल अनेक गुटों में बंटा हुआ है। कुछ नेता ऐसे भी रहे हैं, जो अपनी हठ की वजह से नियमों का पालन नहीं करते।
सिमरनजीत सिंह मान जब लोकसभा के लिए चुने गए थे, तो उन्हें सदन के भीतर तलवार ले जाने से मना किया गया था। वह अपनी जिद पर अड़े रहे और फिर सदन में नहीं गए। जहां तक इंदिरा के हत्यारे के बेटे को उम्मीदवारी देने का मुद्दा है, यह एक विवादास्पद निर्णय है।
लोग तो यही समझेंगे कि ऐसा कदम उठाकर इंदिरा गांधी की हत्या को जायज ठहराया जा रहा है। दलील दी जा सकती है कि पिता के गुनाह के लिए बेटे को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। उसे चुनाव लड़ने का कानूनी तौर पर पूरा हक है। इतने पर भी उसे प्रत्याशी घोषित करने वाले वारिस पंजाब दे की विचारधारा समझी जा सकती है, जो ऑपरेशन ब्लू स्टार व इसके बाद इंदिरा गांधी की हत्या के पुराने अप्रिय प्रसंगों को नए सिरे से याद कराना चाहता है।
यह एक विध्वंसक सोच है। कनाडा की नई मार्क कार्नी सरकार ने भी खालिस्तानियों को समर्थन देने से मना कर दिया है। यदि कोई संगठन देश में फूट डालने तथा एक और विभाजन कराने का सपना देखता है, तो उसे विवेकशील जनता कभी समर्थन नहीं देगी।
किसान आंदोलन के समय भी अमृतपाल की उपस्थिति को विवादास्पद माना गया था। पंजाब में अभी आम आदमी पार्टी की सरकार है। कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव में बीजेपी व कांग्रेस के अलावा अकाली दल के विभिन्न गुट भी मैदान में होंगे। देखना होगा कि वहां की राजनीति कौन-सा मोड़ लेती है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा