Sukhoi Fighter Jet And Missile System Offer To India By Russia: रूस द्वारा भारत को दिए गए सैन्य सहयोग के व्यापक प्रस्ताव में पांचवीं पीढ़ी के 75 सुखोई-57ई लड़ाकू विमान, सुखोई एमकेआई बेड़े का 'सुपर सुखोई' में अपग्रेड, शेष बचे एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की त्वरित आपूर्ति के अलावा पेंट्सिर-एस1एम शॉर्ट-रेंज मिसाइल सिस्टम, पट्टे पर अकुला-क्लास परमाणु पनडुब्बी और वोरोनिश-एम अर्ली वार्निंग रडार तकनीक की पेशकश शामिल है।
नए प्रस्तावों को लेकर उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और भारी खर्च की हो तो हथियारों की क्षमता, लागत, आपूर्ति में लगने वाला समय, उसकी वर्तमान तकनीक और किसी एक देश पर दीर्घकालीन निर्भरता के बारे में आकलन आवश्यक है। अपने 260 से ज्यादा सुखोई-30 विमानों को अगर लंबे समय तक कार्यक्षम रखना है, तो उनके 'सुपर सुखोई' के रूप में अपग्रेडेशन पर आगे बढ़ना ही होगा।
नए विमान खरीदने के बजाय मौजूद प्लेटफॉर्म को अधिक सक्षम बनाने के तौर पर यह प्रस्ताव व्यावहारिक है। पांचवें एस-400 की लंबित आपूर्ति के अलावा अतिरिक्त एस-400 खरीद भी व्यावहारिक विकल्प है। भारत पहले से इस प्रणाली का संचालन कर रहा है, इसलिए प्रशिक्षण, रखरखाव और परिचालन डांचा मौजूद है। इसी तरह पेंटसिर-एस एम का प्रस्ताव भी उपयोगी है। मगर इसे एस-400 के विकल्प की बजाय कम दूरी की 'प्वाइंट डिफेंस' लेवल के बतौर देखना होगा।
बेशक सुखोई-57 आज पांचवीं पीढ़ी का विकसित विमान है, लेकिन हमें उसकी गति या सेंसर-फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सुरक्षित डाटा-लिंक, कम रडार दृश्यता, हथियार और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध में उसकी वास्तविक क्षमता देखनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि सुखोई-57 राफेल, सुखोई-30, अमेरिकी पी-81, अवाक्स, एईडब्लू एंड सी, एस-400, स्वदेशी डिफेंस रडार और भारतीय कमांड-एंड-कंट्रोल नेटवर्क के साथ कितनी सहजता से काम करेगा।
भिन्न देशों की प्रणालियों का एकीकरण अत्यंत जटिल होता है। लगभग 6,000 किलोमीटर दूर तक बैलेस्टिक मिसाइल लॉन्च और अंतरिक्षीय खतरों को निगरानी करने वाला 'वोरोनिश-एम' रडार भले ही भारत की चीन व पाकिस्तान पर नजर रखने की क्षमता को अभूतपूर्व विस्तार दे, लेकिन इतने संवेदनशील उपकरण पर भारत को पूर्ण डाटा-प्रभुत्व, सॉफ्टवेयर एक्सेस और साइबर सुरक्षा को पूर्ण गारंटी चाहिए, यदि रूस अपने सॉफ्टवेयर कोड्स और मिशन सिस्टम में भारत को पूर्ण तकनीकी पहुंच नहीं देता, तो ये हथियार भारतीय नेटवर्क में पूरी तरह फिट नहीं बैठ पाएंगे।
चीन के जे-20 व जे-35 स्टील्थ लड़ाकू विमानों की चुनौती का मुकाबला करने में सुखोई-57 भारत की अग्रिम वायु-श्रेष्ठता को मजबूत करेगा और वोरोनिश-एम रडार और एस-400 मिसाइल नेटवर्क मिलकर तिब्बत पठार से संचालित होने वाली चीनी मिसाइलों और लड़ाकू उड़ानों की पूर्व चेतावनी दे सकेंगे।
पाकिस्तान को चीन से मिली जे-10सी या भावी जे 35 विमानों से उपने असंतुलन को ये खरीदारियां भारत के पक्ष में पूरी तरह झुका देंगी। उधर हिंद महासागर में घटती पनडुब्बी संख्या के बीच अकुला-क्लास एसएसएन यानी 'परमाणु संचालित हमलावर पनडुब्बी' की मौजूदगी भारत की अंडरवॉटर मारक क्षमता और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करेगी। सवाल उठता है, क्या इन सौदों के चलते भारत फिर से रूसी हथियारों पर अति-निर्भरता की ओर बढ़ रहा है?
सबसे अधिक आकर्षक लगने वाला प्रस्ताव है कथित तौर पर 75 सुखोई-57ई विमानों की खरीद। रूस तैयार विमान बेचने के साथ भारत में उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण की पेशकश कर रहा है। अगर एचएएल, डीआरडीओ, बीईएल और निजी भारतीय कंपनियां एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, संचार, वेपन इंटीग्रेशन और मेंटेनेंस रिपेयरिंग और ओवरहॉल में वास्तविक तकनीकी भूमिका पाती हैं, तो यह सौदा भारत के एयरोस्पेस उद्योग के लिए बहुत उपयोगी होगा।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा