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RSS के कड़े तेवर के आगे नरेंद्र मोदी-अमित शाह का सरेंडर, फायर फाइटिंग में जुटी बीजेपी

बीजेपी को संघ की जरूरत है लेकिन संघ के लिए बीजेपी अनिवार्य नहीं है। अब प्रधानमंत्री मोदी ने बीजेपी के सभी मुख्यमंत्रियों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि सभी विधानसभा क्षेत्र के पदाधिकारी अपने संबंधित इलाके में कम से कम 5 से 15 पुराने संघ कार्यकर्ताओं से मुलाकात करें तथा उनके विचारों, सुझावों और शिकायतों को दर्ज करें।

किर्तेश ढोबले

नवभारत डेस्क: समझ में आ गया बीजेपी के शीर्ष नेताओं को कि वह कितने पानी में हैं। उनकी घमंड, अकड़ और बड़बोलेपन को लोकसभा चुनाव में जनता ने इतना करारा झटका दिया कि पार्टी की सीटें 303 से घटकर 240 पर आ गई। बीजेपी का ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा खोखला साबित हुआ क्योंकि नेताओं के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बड़े आत्मविश्वास से गर्वोक्ति की थी कि अब बीजेपी इतनी सशक्त और सामर्थ्यवान हो गई है कि उसे संघ पर निर्भरता की जरूरत नहीं रह गई है। अपने अभिभावक संगठन को इस तरह नकारना बीजेपी के लिए आत्मघाती रहा। अयोध्या में रामलला मंदिर निर्माण के बाद से बीजेपी को गलतफहमी हो गई थी कि देश के सारे हिंदू वोट उसकी जेब में हैं। सत्ता के उन्माद में कुछ विचित्र अनुभूतियां भी होने लगी थीं। तभी तो प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि मुझे लगता है कि मैं बायोलॉजिकल नहीं हूं।

उनका आशय था कि ईश्वर ने कुछ विशिष्ट कार्य का मिशन पूरा करने के लिए उन्हें भारत भूमि में भेजा है। जब चुनावी नतीजे आए तो बीजेपी बहुमत से 32 सीटें पीछे थी। इसलिए डूबते को तिनके का सहारा के समान बीजेपी को एनडीए के साथी दलों का सहारा लेना पड़ा। चंद्राबाबू नायडू की टीडीपी और नीतीश कुमार की जदयू का सहयोग लेकर मोदी-3 सरकार बनी। जिस एनडीए की बीजेपी परवाह नहीं करती थी वही उसका तारणहार बना। बदले में विशेष बजट पैकेज देकर नायडू और नीतीश कुमार को संतुष्ट भी करना पड़ा।

संगठन से समन्वय रखें

बीजेपी मुख्यमंत्रियों की बैठक में एक तरह का आत्मावलोकन किया गया। बैठक का एजेंडा अपने कोर (बुनियादी) मतदाताओं तक पहुंचने और आरएसएस के साथ समन्वय बनाने का था। इसके अलावा संगठन और सरकार के बीच की दूरी को खत्म करने पर भी विचार-विमर्श किया गया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों जिस तरह के कड़े तेवर दिखाए, उसे देखते हुए बीजेपी नेतृत्व बैकफुट पर आ गया। उसे समझ में आ गया कि संघ से दूरी बनाने का मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है। नेताओं को यह भी ध्यान में आ गया कि पहले जनसंघ और फिर बीजेपी की जइ़ आरएसएस में ही रही है। एक समय तो संघ का इतना दबदबा था कि नानाजी देशमुख और दत्तोपंत ठेंगडी जैसे संघ के नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की नीतियों की तीखी आलोचना की थी। थिंक टैंक कहलाने वाले गोविंदाचार्य भी वाजपेयी पर बरसा करते थे।

मुख्यमंत्रियों को नसीहत

बीजेपी के कुछ नेताओं की धारणा रही है कि संघ स्वयंसेवकों की ड्यूटी उनकी प्रचार मुहिम को संभालना और उन्हें चुनाव जिताना है। इसलिए वे इसे कैडर को अपना मानकर निश्चिंत हो गए थे। उन्होंने यह नहीं सोचा था कि संघ जब हाथ खींच लेता है तो ऐसे नेताओं को औंधे मुंह गिरने की नौबत आ जाती है। बीजेपी को संघ की जरूरत है लेकिन संघ के लिए बीजेपी अनिवार्य नहीं है। अब प्रधानमंत्री मोदी ने बीजेपी के सभी मुख्यमंत्रियों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि सभी विधानसभा क्षेत्र के पदाधिकारी अपने संबंधित इलाके में कम से कम 5 से 15 पुराने संघ कार्यकर्ताओं से मुलाकात करें तथा उनके विचारों, सुझावों और शिकायतों को दर्ज करें। इसके आधार पर संबंधित क्षेत्र में पार्टी संगठन को मजबूत करने की दिशा में उचित कदम उठाएं।

अंतर्कलह पर विचार

बीजेपी मुख्यमंत्रियों की बैठक में यूपी और महाराष्ट्र में चल रही अंदरूनी उठापटक तथा लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के मुद्दों पर भी चर्चा की गई। यूपी में हाल ही में केशवप्रसाद मौर्य ने सीएम योगी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका था। सभी उपमुख्यमंत्रियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि राज्य में मुख्यमंत्री ही उनके मुखिया हैं उनके खिलाफ बयानबाजी को अनुशासनहीनता माना जाएगा और कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा

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