रेल किराया (सौ. डिजाइन फोटो) 
नवभारत विशेष

संपादकीय: रेल किराया तय करने का फॉर्मूला गोपनीय

Indian Railway Fare Policy: सूचना का अधिकार होने के बावजूद रेलवे किराया निर्धारण को ट्रेड सीक्रेट बताकर छुपाया जा रहा है। पारदर्शिता, सीआईसी की भूमिका और RTI की सच्चाई पर विश्लेषण बताया गया है।

दीपिका पाल

नवभारत डिजिटल डेस्क: जब सूचना पाने का अधिकार दिया गया है तो तथ्यों को क्यों छुपाया जाता है एक आवेदन देकर जानना चाहा था कि रेलवे अपना यात्री किराया विभिन्न श्रेणियों के लिए, विभिन्न स्थितियों में जैसे कि 'तत्काल', कैसे निर्धारित करती है? 2 वर्ष प्रतीक्षा के बाद यह आवेदन यह कहकर रद्द कर दिया गया कि यह ट्रेड सीक्रेट या बौद्धिक संपदा है जिसे जाहिर नहीं किया जा सकता। मतलब यह कि रेल अपने व्यवसाय की गोपनीयता बनाए रखना चाहती है और बताना नहीं चाहती कि ट्रेनों का किराया किस आधार पर तय किया या बढ़ाया जाता है? आमतौर पर गोपनीयता इसलिए रखी जाती है ताकि प्रतिस्पर्धी इसे जान न पाएं लेकिन मुद्दा यह है कि भारतीय रेलवे का प्रतिस्पर्धी कौन है? देश में आप कहीं भी ट्रेन से प्रवास करें, वह भारतीय रेल ही है।

केवल एक ट्रेन तेजस एक्सप्रेस है जो आईआरसीटीसी द्वारा चलाई जाती है। यह ट्रेन भी रेल मंत्रालय के अंतर्गत आती है। इसलिए यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि किसी ट्रेन के सेकंड क्लास एसी कोच के किराए का निर्धारण कैसे किया जाता है। केंद्रीय सूचना आयोग ने रेल विभाग का यह तर्क मान लिया कि उसकी जानकारी शासकीय गोपनीयता कानून के तहत आती है। दूसरी ओर सीआईसी ने कस्टम विभाग की इस दलील से भी सहमति व्यक्त की थी कि मेघालय से बांग्लादेश चूना निर्यात करने के व्यवसाय के बारे में जानना जनहित में जरूरी नहीं है। इसके बावजूद अनुसंधानकर्ताओं और पर्यावरण वादियों को सार्वजनिक रूप से यह जानकारी मिलनी चाहिए।

30 वर्ष पहले सूचना का अधिकार इसलिए लाया गया था कि प्रशासन तंत्र में पारदर्शिता बढ़े। केंद्रीय सूचना आयोग या सीआईसी पर इसकी जिम्मेदारी थी। 2011 में आयोग ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 100 बड़े डिफाल्टर के नाम जाहिर करने के मुद्दे पर भारतीय रिजर्व बैंक की आपत्ति को ठुकरा दिया था। यह मामला अब बड़ी बेंच के सामने गया है।

2017 में एक आवेदक ने जानना चाहा था कि सरकार यह बताए कि उसने रूस द्वारा विमानवाही पोत आईएनएस विक्रमादित्य के निर्माण का बिल बढ़ाए जाने पर सहमति क्यों दी? इस मुद्दे पर सीआईसी ने आवेदक का साथ दिया था। इतने वर्षों के बाद अब भारत में पारदर्शिता बढ़नी चाहिए लेकिन यदि सीआईसी योग्य आवेदनों को ठुकरा देगा तो जानकारी कैसे मिल पाएगी? सीआईसी में 9 वर्षों बाद अब पूरे 10 आयुक्त हैं लेकिन उसके पास 32,000 मामलों का बैकलॉग है जिनका निपटारा करने में उसे 3 वर्षों से ज्यादा समय लगेगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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