राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई सवाल (सोर्स: सोशल मीडिया) 
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नवभारत विशेष: पानी भरे इंजेक्शन से महिलाओं की मौत, राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था निकृष्ट

Rajasthan Health Crisis: राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। खराब दवा, अस्पतालों में अव्यवस्था, संसाधनों की कमी व प्रशासनिक समन्वय के अभाव से मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है।

अंकिता पटेल

Rajasthan Public Healthcare System: राजस्थान के मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि यहां की चिकित्सा व्यवस्था का क्या हाल है? हालात इतने बदतर हो गए हैं कि खुद मुख्यमंत्री तथा चिकित्सा मंत्री परेशान हैं। मरीजों को बेहतर उपचार मिले, इसके लिए भारी भरकम स्टाफ होने के बाद भी मुख्यमंत्री को खुद कार्रवाई करनी पड़ रही है। घटिया दवाओं के सप्लायरों ने इतना मकड़जाल फैला रखा है कि मरीजों की मौत के बाद उन पर कोई कार्रवाई तब तक नहीं होती, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि मरीज की मौत अमुक दवा से हुई है और यह सिद्ध होने में वर्षों गुजर जाते हैं।

अस्पतालों में छतों से गिरता प्लास्टर मरीजों की जान ले रहा है, एबुलेंसों में आक्सीजन नहीं होने के कारण मरीज दम तोड़ रहे हैं। ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों के लिए मरीज इंतजार करते हैं। इमरजेंसी में पट्टियां तक मरीजों से मंगाई जाती हैं, चूहों द्वारा बच्चों को काटना तो एक आम बात हो चुकी है। माइनर ओटी में स्टेर्लाइज मशीन तक चालू नहीं हैं।

राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खीमसर कह रहे हैं कि डिलीवरी के बाद महिलाओं को जो ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया जाता है, उसमें दवा थी ही नहीं। वे उसमें पानी होना मानते हैं। इसके विपरीत ड्रग कंट्रोलर कमिश्नर टी. सुमंगला कह रही हैं कि इंजेक्शन के कारण नहीं बल्कि इन इंजेक्शन के बाद जो दवाएं उन्हें दी जानी चाहिए थीं, वह नहीं दी गई।

डॉक्टरों को कारण बताओ नोटिस दिलवाने के लिए जब मुख्यमंत्री को आदेश देना पड़े तो समझ में आ जाता है कि किस तरह से उपचार के नाम पर मरीजों का शोषण हो रहा है। इस समय भारत के अधिकांश मेडिकल कॉलेज या बड़े सरकारी अस्पतालों की इमारतें कम से कम 100 साल पुरानी हैं।

चाहे वह लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज हो, जयपुर का एसएसएस कॉलेज हो या फिर देश के वह अस्पताल, जहां पर आउटडोर कम से कम 20 हजार का है और इंडोर में इतने मरीज हैं कि एक बेड पर दो-दो मरीज रहते हैं। अस्पतालों की खराब स्थिति यह है कि कब कहां की छत का प्लास्टर गिर जाएगा, पता ही नहीं होता। कितनी बार तो ऑपरेशन के दौरान ही छत से सीमेंट गिर गया।

अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था: छत गिरने से लेकर चूहों और अव्यवस्थित एंबुलेंस तक

सवाई माधोपुर में सरकारी अस्पताल में छत का एक हिस्सा गिरने से महिला और दो बच्चियां घायल हो गईं, लखनऊ में वीआईपी अस्पताल का दर्जा पाए सिविल अस्पताल में फॉल्स सीलिंग गिरने से खुद मुख्यमंत्री नाराज हुए थे।

चूहे तो वार्डों में ऐसे घूमते हैं जैसे वह भी मरीज हों और यहां पर उपचार के लिए आए हुए हों? मासूम बच्चों को काट लेना आम घटनाएं हैं, जिन्हें अस्पताल प्रशासन यह कहकर टाल देता है कि जहां पर खाने-पीने की वस्तुएं होंगी, वहां पर यह आम बात है। इंदौर में भी यही कहानी थी। अब जब बारिश का मौसम आ रहा है तो करंट लगने की घटनाओं के साथ ही वार्डों में पानी भरने से हालात और बिगड़ने वाले हैं।

दवा और अस्पतालों के साथ ही एक नजर एंबुलेंसों की स्थिति पर डाल लें। कभी इनमें ऑक्सीजन नहीं रहती तो कभी इनका सिलेंडर ही नहीं खुलता। मुरादाबाद में कुछ समय पहले सिलेंडर को खोलने के लिए हथौड़े का प्रयोग करना पड़ा था। समझिए कि जब ऑक्सीजन सिलेंडर की स्थिति यह है तो शेष एंबुलेंस की हालत क्या होगी ?

राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था निकृष्ट

राजस्थान में घटिया दवाओं के कारण एक दर्जन के करीब प्रसूताओं की किडनियां फेल हो जाने से तहलका मच गया है। यहां गत 2 माह में कम से कम आधा दर्जन से अधिक प्रसूताओं की मौत हो चुकी है तथा कई की किडनियां इतनी खराब हो चुकी हैं कि वह 'लाइफ सपोर्ट' पर जिंदा हैं। इनके नवजात मासूम बच्चे अब दादी-नानी के भरोसे पल रहे हैं।

गत माह कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज में सिजेरियन के बाद अचानक तबीयत बिगड़ी और एक-एक कर 5 महिलाओं की मौत हो गई। अब जून माह में बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में यही कहानी दोहराई गई और सिजेरियन प्रसव के बाद यहां पर आधा दर्जन प्रसूताओं की तबीयत खराब होने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया। उनकी भी किडनियां खराब होना बताया जा रहा है। जिन इंजेक्शनों में दवा होनी चाहिए थी, उनमें पानी था।

लेख- मनोज वार्ष्णेय के द्वारा

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