Parliament Monsoon Session Debate Disruption: निरंतर विरोध प्रदर्शन, व्यवधान व तीखे वाक् प्रहार के तिबीच हुए संसद के मानसून सत्र का समापन हो गया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार इस सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन बहस के स्तर से वह भी असंतुष्ट थे। लोकसभा की उत्पादकता गिरकर 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही। विधेयकों की पड़ताल या उन पर विचार-विमर्श नहीं हो पाया। विपक्ष पर व्यवधान डालने का ठप्पा लगाया जाता है, लेकिन जब पेपर लीक, युवाओं पर पैलेट गन चलाए जाने जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जवाब देने से सरकार कतराए, तो विपक्ष का उबल पड़ना स्वाभाविक है।
सरकार को बहस के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करनी चाहिए। यदि विपक्ष चाहता है कि स्वस्थ बहस हो, तो उसे भी नारेबाजी से बचना होगा। पीठासीन अधिकारी का सम्मान कायम रखना पक्ष-विपक्ष दोनों का कर्तव्य है। दूसरी बात यह भी है कि यदि विरोध न करे और खामोश रहे तो यह उसकी संवैधानिक भूमिका के खिलाफ होगा। सरकार को जवाबदेह बनाना विपक्ष की जिम्मेदारी है। संसद की कार्यवाही से प्रश्नकाल हटाए जाने की वजह से मंत्री तीखे सवालों से बच निकलते हैं।
हंगामे के दौरान विधेयक बगैर जांच-पड़ताल के पारित कर दिए जाते हैं या लटक जाते हैं। संसद को सुगमता से चलाने की जिम्मेदारी सरकार और विपक्ष दोनों की संयुक्त रूप से है। इस सत्र में लोकसभा में 17.5 घंटे तथा राज्यसभा में 37.37 घंटे कामकाज हुआ। संसद में प्रति मिनिट कामकाज पर 2.5 लाख रुपये खर्च आता है। एक पूर्ण सत्र की लागत 130 करोड़ रुपये पड़ती है।
यह देश की आम जनता या करदाता का पैसा है, जिसका जनहित में सदुपयोग होना चाहिए। संसदीय कामकाज सुगमता से चलाने पर सरकार, विपक्ष तथा पीठासीन अधिकारी के बीच समझौता होना चाहिए, विपक्ष के प्रश्नों का भी उचित स्तर हो। मंत्री भी संसद में अपनी जवाबदेही से पीछे न हटें। संसद में उपस्थिति, प्रश्नों, बहस, समितियों के कामकाज को डॅशबोर्ड पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
गृहमंत्री का बयान सुनकर उसे चुनौती दी जा सकती थी। शोर मचाकर कार्यवाही ठप करना किसी मुद्दे का समाधान नहीं है। इस सत्र में भी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चला। एक-दूसरे के प्रति भारी कटुता देखी गई।
मानसून सत्र के पहले आम आदमी पार्टी, टीएमसी, शिवसेना (उबाठा) के सांसद फूटकर एनडीए में शामिल हो गए। इससे लगा था कि सरकार परिसीमन बिल तथा एक राष्ट्र एक चुनाव जैसे विधेयक दो तिहाई बहुमत से पारित कराने का प्रयास करेगी, लेकिन डीएमके ने अपनी बंद मुट्ठी अंत तक नहीं खोली।
संख्याबल के अभाव में सरकार यह बिल नहीं ला सकी। संपूर्ण सत्र पर पेपर लीक और जेन जी का आंदोलन हावी रहा। पहला सप्ताह धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तथा दूसरा सप्ताह छात्रों पर लाठी प्रहार व पैलेट गन चलाए जाने के मुद्दे पर अमित शाह के बयान की मांग को लेकर बीत गया। विपक्ष ने प्रधानमंत्री से माफी मांगने के लिए भी जोर दिया। प्रधानमंत्री व गृहमंत्री ने संसद से पीठ फिरा ली। इस तरह यह सत्र फलदायी नहीं रहा।