छगन भुजबल (डिजाइन फोटो) 
नवभारत विशेष

अब कोई विकल्प शेष नहीं रहा, क्या भाजपा में शामिल हो सकते हैं छगन भुजबल?

महाराष्ट्र की नवगठित महायुति सरकार के मंत्रिमंडल में छगन भुजबल को जगह नहीं दी गई। जिसके चलते छगन बेचैन नजर आ रहे हैं। इसके पीछे राजनीतिक पंडितों के अलग-अलग तर्क दे रहे हैं।

मृणाल पाठक

नवभारत डेस्क: युवाओं को अवसर प्रदान करने के नाम पर अजीत पवार ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल को मंत्री पद से वंचित रखा। वैसे इसका कारण कुछ और भी हो सकता है। एक तो अजीत अपनी पार्टी के मराठा समाज को संतुष्ट रखना चाहते थे और दूसरे उन्हें यह भी आशंका रही होगी कि भुजबल समानांतर नेतृत्व न देने लगें। मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिलने से भुजबल बेचैन हैं। उनके जैसे वरिष्ठ, अनुभवी तथा ओबीसी में वर्चस्व रखनेवाले नेता को मंत्री नहीं बनाना ऐसा आघात है जिसे पचाना भुजबल के लिए कठिन है।

जब भुजबल को अंदेशा हो गया कि उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाएगा तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया। अपनी पार्टी के नेताओं पर आक्रामक भाषा में आरोपों की तोप भी दागी। अब मंत्रिमंडल में सिर्फ एक जगह बची है जो कि बीजेपी के हिस्से में जाएगी।

इसे देखते हुए भुजबल के पास विकल्प नहीं है। या तो वह शांत बैठ जाएं अथवा अपने समर्थकों के साथ नई पार्टी गठित कर लें। आगामी 5 वर्षों तक सत्ता से बाहर रहना उन्हें बहुत अखरेगा। अजीत पवार उन्हें राज्यसभा में भेजने को उत्सुक थे लेकिन भुजबल को राज्य की राजनीति में ही रहना था।

अजीत पवार से खटकने के बाद अब भुजबल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भेंट की। उन्होंने कहा भी कि इस मुलाकात में राजनीतिक चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने उन्हें 8-10 दिन में समस्या का सम्मानजनक हल निकालने का आश्वासन दिया। भुजबल की निगाह बीजेपी कोटे के रिक्त मंत्री पद पर है।

इससे बीजेपी को यह लाभ हो सकता है कि एक बड़ा ओबीसी नेता साथ में आ जाएगा। क्या भुजबल बीजेपी में शामिल होने की घोषणा करेंगे? भुजबल से भेंट के बाद फडणवीस ने कहा भी कि छगन भुजबल जैसे नेता की राजनीति में उपेक्षा नहीं की जा सकती। इतने पर भी यह स्पष्ट नहीं है कि बीजेपी ने मंत्रिमंडल का एक स्थान किसके लिए रोक रखा है!

यदि यह जगह नहीं मिली तो भी मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के एकाध मंत्री को इस्तीफा देने के लिए कहकर भुजबल को मंत्री बना सकते हैं। बीजेपी के केंद्रीय नेता भी चाहेंगे कि ओबीसी में पार्टी के आधार की मजबूती के लिए भुजबल को साथ लिया जाए।

राजनीतिक क्षेत्रों में उत्सुकता है कि मुख्यमंत्री अगले 8-10 दिनों में ऐसा कौन सा कदम उठाते हैं जिससे भुजबल का असंतोष और नाराजगी दूर हो सके। इतना तो मुख्यमंत्री भी जानते हैं कि भुजबल के सामने कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया है। वह केंद्र में जाना नहीं चाहते और राज्य की राजनीति में मंत्री पद के बगैर रह नहीं सकते।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा

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