Highlights
लेख में डॉ. राममनोहर लोहिया और अन्य समाजवादी नेताओं के योगदान का जिक्र किया गया।
नेहरू के ‘सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी’ के विचार को याद किया गया।
समाजवाद के नाम पर चंदा वसूलने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया।
समाजवाद के सिद्धांतों और उसके नाम पर होने वाली राजनीति पर कटाक्ष किया गया।
Indian Socialist Movement and Political Satire: पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, देश में एक समय ऐसा भी था, जब समाजवाद शब्द बहुत प्रचलित था। तब डॉ। राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, आचार्य कृपलानी, एच. वी. कामथ, एस. एम. जोशी, मधु दंडवते, मधु लिमये के नाम बहुत सुने जाते थे। प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने भी सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी अपनाया था। मूल भावना यही थी कि राष्ट्र की संपत्ति पर समाज का हक हो। वह कुछ खास पूंजीपतियों के हाथों में केंद्रित न रहे। कम्युनिज्म हिंसा में विश्वास रखता था जबकि समाजवाद अहिंसक था।'
हमने कहा, 'तब लोग समाजवाद के नाम पर चंदा बटोरते थे। वह लोगों से कहते थे- समाजवाद आ रहा है जिसके लिए तैयारी करनी है। पैसा दो। अज्ञानी लोग समझते थे कि समाजवाद किसी नेता का नाम है। वह बार-बार चंदा देते थे लेकिन समाजवाद के दर्शन नहीं होते थे। वह बस आता ही रहता था। कुछ लोगों ने तब समाजवाद का अर्थ लगाया था कि अपने-अपने समाज या जाति को आगे बढ़ाओ। तब रूस भी यूनाइटेड सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक कहलाता था।'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, जनसंधियों ने भी इमरजेंसी के दौरान जेल में रहते हुए समाजवादियों से दोस्ती की थी। दोनों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई थी जिसमें कांग्रेस के असंतुष्ट नेता मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह व जगजीवनराम भी शामिल हो गए थे। जब अटलबिहारी वाजपेयी और आडवाणी के आरएसएस से गहरे संबंधों को लेकर समाजवादियों ने दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाकर आपत्ति जताई तो जनता पार्टी टूट गई। अटल-आडवाणी ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बना ली। यह सारा कांड राजनारायण और मधु लिमये की वजह से हुआ जो कि संघ को सांप्रदायिक मानते थे।'
हमने कहा, 'समाजवादी पार्टी या सपा आज भी अखिलेश यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में दूसरे नंबर की हैसियत रखती है। वह 2027 के विधानसभा चुनाव में राममंदिर चंदा चोरी, पेपरलीक, वोट चोरी जैसे मुद्दों को लेकर बीजेपी को कड़ी टक्कर देगी।'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत मजबूत हैं। सपा खंडहर हो चुकी है। वैसे कहावत है कि खंडहर बता रहे हैं कि इमारत कभी बुलंद थी। आज का जमाना अंबानी और अदाणी जैसे बड़े पूंजीपतियों और कॉरपोरेट का है। समाजवाद काफी पहले छूमंतर हो चुका है।'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा