पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 90% भारतीयों का मतदान अधिकार छीनने की राय दी।
उन्होंने जाति और धर्म के आधार पर मतदान को लोकतंत्र की कमजोरी बताया।
लेख में काटजू की टिप्पणी की आलोचना करते हुए समान वयस्क मताधिकार को लोकतंत्र की खासियत बताया गया है।
Markandey Katju Democracy Statement Controversy: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मार्कंडेय काटजू से हमें यह उम्मीद नहीं थी कि वह लोकतंत्र का विरोध करते हुए तानाशाही का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र देश का सबसे बड़ा दुश्मन है। भारत के 90 प्रतिशत लोग मतदान करने के पात्र नहीं हैं। उनका मतदान का अधिकार छीन लिया जाना चाहिए।'
हमने कहा, 'मार्कंडेय काटजू हमेशा जरा हटकर अनोखी और बेबाक टिप्पणी करते हैं जिसकी खबर बन जाती है। उनकी अपनी दलील होती है। वह इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं करते कि कोई उनके विचारों से सहमत है या नहीं!'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, बोलने के पहले कुछ तो सोचना चाहिए कि उनकी बातों से कैसा संदेश जाएगा। जब काटजू से पूछा गया कि देश के 13 करोड़ लोगों का मताधिकार छीना गया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन हो रहा है, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है तो काटजू ने मुंहफट तरीके से कहा कि और भी मत चोरी होने दो। आप लोग मतदान करने लायक नहीं हैं। देश के 90 प्रतिशत मतदाता उम्मीदवार का गुण-दोष कुछ भी न देखते हुए, समाज और जाति देखकर मतदान करते हैं। इसलिए अयोग्य व नाकारा लोग चुन लिए जाते हैं। राजनीतिक पार्टियां जाति और धर्म के आधार पर विद्वेष फैलाती हैं। लोकतंत्र ऐसे लोगों के लिए है जिनमें बुद्धि, समझदारी, विवेक और विकसित विचारशक्ति हो। डेमोक्रेसी अनाड़ी लोगों के लिए नहीं है।'
हमने कहा, 'पूर्व न्यायाधीश काटजू हमेशा खुलकर बोलते हैं। यह उनके मन की बात है, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि संविधान ने वयस्क मताधिकार दिया है। जो पहले 21 वर्ष की आयु होने पर लागू था फिर 18 वर्ष कर दिया गया। शादी करने के लिए युवक को 21 वर्ष का होना चाहिए, वोट डालने के लिए 18 साल की उम्र काफी है। विद्वान हो या अनपढ़, रईस हो या टुटपुंजिया, मालिक और नौकर सभी को समान रूप से मताधिकार दिया गया है। यही हमारे लोकतंत्र की खासियत है। काटजू की राय मानी जाए तो सिर्फ सुशिक्षित और प्रतिष्ठित लोग ही वोट डाल पाएंगे। उनकी निगाह में अशिक्षित और अनाड़ी लोग भेड-बकरी हैं जिन्होंने लोकतंत्र को भीडतंत्र बना रखा है।'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा