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Navbharat Nishanebaaz: जब मन आया कर दी हड़ताल, ऐसा है बैंक कर्मियों का हाल

Bank Employees Strike: बैंक कर्मचारियों की हड़ताल और उनकी मांगों को लेकर ‘निशानेबाज’ और पड़ोसी के बीच दिलचस्प बातचीत। चर्चा में बैंकिंग व्यवस्था और ग्राहकों की परेशानी पर व्यंग्य किया गया है।

अंकिता पटेल

Bank Strike and Employees: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, पिछले दिनों बैंकों की हड़ताल हुई जो शीघ्र ही वापस भी हो गई। हमें समझ में नहीं आता कि जिस देश में लाखों पढ़े लिखे बेरोजगारों के पास काम नहीं है, किसान सूखे की विभीषिका से जूझ रहे हैं, वहां अच्छा खासा वेतन पानेवाले बैंक कर्मी प्रायः हर साल हड़ताल क्यों करते हैं और वह भी छुट्टियों या त्योहार से लगे हुए कार्यदिवसों में? उनकी हड़ताल से खातेधारकों और व्यापारियों के हाथ पैर फूल जाते हैं।'

हमने कहा, 'संगठित क्षेत्र के कर्मचारी अपनी मांग को लेकर हड़ताल करते आए हैं। उनकी घोषणा रहती है हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है।'

पड़ोस ने कहा, 'निशानेबाज, कैसा जोर जुल्म? बैंकों का एम्बिएंस या माहौल कितना सुखद और अनुकूल होता है। सजीले चमचमाते काउंटर और शीशे के पार्टीशन वाले काउंटर, कैशियर व मैनेजर के केबिन, सबके सामने कंप्यूटर। रकम बढ़ानेवाली स्कीमों के ब्राशर, कोरे ड्राफ्ट, भरे हुए चेक, प्रतीक्षा करते ग्राहक, दरवाजे पर बंदूकधारी गार्ड ! इस मायानगरी में कैश काउंटर के बाबू को देखिए जो एकाग्रचित्त से नोटों के बंडल गिनता चला जाता है। फिर काउंटिंग मशीन में डालकर अपनी गिनती को कन्फर्म भी कर लेता है। बंडल में रबर बैंड लगाकर दराज में डालता है।'

हमने कहा, 'बैंक कर्मियों को अधिक वेतन मिलना ही चाहिए। जिस तरह मछली पानी से जुदा नहीं हो सकती, उसी तरह बैंक कर्मचारी नोटों से जुदा नहीं हो सकता। देश के किसी भी हिस्से में सूखा पड़ जाए लेकिन बैंक में कभी सूखा नहीं पड़ता। वहां तरलता प्रवाहित होती रहती है जिसे लिक्विडिटी ऑफ बैंक कहा जाता है।'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, ग्राहकों की असुविधा पर भी विचार कीजिए, हड़ताल में उनके चेक अटक जाते है। लेनदेन, डिपाजिट करने में दिक्कत जाती है।'

हमने कहा, 'बैंक में ग्राहक का अस्तित्व 14 डिजिट के अकाउंट नंबर से होता है। कभी उसे टोकन नंबर से भी बुलाया जाता है। बैंक कर्मी फैसला करते हैं कि उनका ग्राहक कितना हैसियतदार है। उसका चेक ऑनर किया जाए या डिसऑनर ! क्रिकेट खेलते समय गेंद बाउंस होना अलग बात है मगर बैंक में चेक बाउंस हो जाए तो लेने के देने पड़ जाते हैं। बैंक किसानों पर क्रूर और बड़े उद्योगपतियों पर मेहरबान होता है जिनका बड़ा कर्ज राइट ऑफ कर देता है।'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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