NEET Exam Security Controversy: पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने, फर्जी अभ्यार्थियों के परीक्षा में बैठने, बायोमेट्रिक धोखाधड़ी और संगठित नकल के मामलों ने परीक्षा संचालकों को सुरक्षा के प्रति अत्यधिक सतर्क बनाना ही था। यह सुरक्षा के नाम पर हास्यास्पद स्थिति थी। कहीं परीक्षार्थियों की नोज पिन पर टेप लगाया गया, कहीं हाथों में बंधे धार्मिक कलावे कटवाए गए, कहीं बुर्का पहनकर आने वाली परीक्षार्थियों के प्रवेश पर विवाद खड़ा हुआ, तो कहीं कुछ मिनटों की देरी के कारण विद्यार्थियों को परीक्षा कक्ष में प्रवेश नहीं दिया गया।
क्या वास्तव में यह सारी कवायद सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर जरूरी थी? नीट निःसंदेह आज भारत की सबसे बड़ी राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं से एक है। लाखों विद्यार्थी एक ही दिन इस परीक्षा में बैठते हैं और परिणाम उनके भविष्य को तय करता है। परीक्षाएं हमेशा चाक-चौबंद होनी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर जबर्दस्त पैनिक क्रिएट किया जाए, इससे दहशत और हताशा दिखती है। जिस तरह सुरक्षा के नाम पर हड़बड़ी देखी गई, वह दुर्भाग्यपूर्ण थी।
देश में एक दर्जन से ज्यादा छात्रों को महज कुछ मिनटों की देरी से परीक्षा केंद्र पहुंचने पर परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया। जबकि इस देरी में उनकी लापरवाही कम, लेट के लिए पैदा हुई परिस्थितियां ज्यादा जिम्मेदार थीं। कई छात्रों को हजारों किलोमीटर दूर का एग्जाम सेंटर मिला था।
भुवनेश्वर की एक छात्रा को देहरादून का केंद्र मिला था, हालांकि जिसे बाद में एनटीए द्वारा सही किया गया। जिस तरह से नीट परीक्षा के लिए 18 लोकेशन पर क्वेश्चन पेपर पहुंचाने के लिए 200 उड़ाने संचालित की गई, वह भी अपने आपमें कोई उपलब्धि नहीं, एक तरह से निराशा की ही बात है। क्या अब सेना सरहदों की सुरक्षा के अलावा इस तरह की प्रशासनिक व्यवस्था भी खुद देखेगी? जिस तरह से वायु सेना ने एक हफ्ते तक इस मिशन के लिए अपनी सेवाएं दीं, वह कोई आदर्श मॉडल नहीं है। पुलिस प्रशासन और सरकार को यह जिम्मेदारी खुद ही लेनी होगी। करीब 7 हजार एग्जाम आब्जर्वर, 2 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की परीक्षा व्यवस्था को सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए तैनाती और करीब 5 हजार से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे व अत्याधुनिक बायोमेट्रिफिकेशन, ये सारे तामझाम की जरूरत इसलिए पड़ी कि परीक्षा व्यवस्था बेहद करप्ट हो चुकी है।
एग्जाम सेंटर्स पर अभ्यार्थियों की पहचान के लिए आधार बेस्ड बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, हाई सेंसिटिव मेटल डिटेक्टर से जांच, एक्स्ट्रा बायोमेट्रिक मशीनों और ट्रेंड कर्मियों की तैनाती, ये सब व्यवस्था इसलिए करनी पड़ीं, क्योंकि धीरे-धीरे करके परीक्षा आयोजित कराने वाला तंत्र लापरवाही की बड़ी मिसाल बन गया। इस सबकी कीमत न सिर्फ परीक्षार्थियों को बल्कि उनके मां-बाप और पूरे देश को भुगतनी पड़ी।
2 बजे से परीक्षा के लिए 11 बजे केंद्र में पहुंचने की आवश्यकता, डेढ़ बजे के बाद एंट्री न होने का फरमान, एडमिट कार्ड और फोटो आईडी और दो फोटो साथ रखने की जिम्मेदारी, इस सबकी जिस बदहवासी में व्यवस्था की गई, उसमें ट्रैफिक और मौसम की भूमिका के लिए कोई स्पेस नहीं रखा गया।
यही कारण है कि दर्जनभर से ज्यादा छात्र परीक्षा में बैठने से वंचित रह गए, राजस्थान में कुछ छात्र इसलिए अपने सेंटर्स तक समय के पहले नहीं पहुंच पाए, क्योंकि शहर में जाम था। कुछ मिनटों की देरी से सेंटर पहुंचने वाले कुछ छात्रों को आखिर क्यों नहीं परीक्षा में बैठने दिया गया? जबकि वो और उनके मां-बाप रो-गिड़गिड़ा रहे थे।
नीट (यूजी) रीएग्जाम केवल एक परीक्षा नहीं थी, बल्कि भारतीय परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और प्रशासनिक क्षमता की भी परीक्षा थी। परीक्षा में 22 लाख से ज्यादा विद्यार्थी शामिल हुए और देश में पहली बार नीट के क्वेश्चन पेपर एयरफोर्स के एमआई-17 विमानों द्वारा पहुंचाए गए।
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परीक्षा के एक दिन पहले 551 शहरों में बने 6,669 एग्जाम सेंटर्स पर मॉक ड्रिल की गई। परीक्षा की व्यवस्था संभालने के लिए 2 लाख से ज्यादा कर्मचारी लगाए गए। साथ ही हर जगह आब्जर्वर भी मौजूद रहे। एनटीए ने दावा किया कि लीक रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए।