चुनाव आयोग विवाद, राहुल गांधी फोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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नवभारत विशेष: जंतर-मंतर से उठी युवा आवाज, चुनाव आयोग के खिलाफ तेज हुआ विरोध

Youth Protest India: नीट आंदोलन से लेकर चुनाव आयोग के विरोध तक युवा आक्रोश तेज है। राहुल-प्रियंका गांधी की भूमिका और पुलिस कार्रवाई ने लोकतंत्र व नागरिक अधिकारों पर बहस छेड़ दी है।

अंकिता पटेल

CJP Rahul Gandhi Election Commission Protest: नीट परीक्षा में धांधली के खिलाफ सीजेपी ने जिस युवा वर्ग को संगठित कर जंतर-मंतर पर आंदोलन किया था, वही युवा शक्ति की लहर अब आगे बढ़कर चुनाव आयोग की मनमानी को चुनौती देने के लिए राहुल गांधी व प्रियंका गांधी के नेतृत्व में प्रभावी तरीके से आगे बढ़ रही है। इन दोनों नेताओं से पुलिस का व्यवहार जनअसंतोष को और हवा दे सकता है। विपक्ष भी सीईसी को हटाने के लिए लामबंद हो गया है। 10 अक्टूबर से सीजेपी भी आंदोलन करेगी।

सरकार की ओर से किसी तरह के सामंजस्य की गुंजाइश दूर-दूर तक नजर नहीं आती। पिछले समय भी सरकारों को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं है। लोकतंत्र संवाद का भी नाम है, जो सरकार विपक्ष और युवाओं से संवाद खो देती है, वह धीरे-धीरे भविष्य से भी संवाद खोने लगती है।

पुलिस कानून लागू करती है, लेकिन लोकतंत्र में उसका दायित्व केवल भीड़ नियंत्रित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है। युवाओं के प्रदर्शन को दबाने या कुचलने के लिए पुलिस ने जिस तरह का बर्बर बल प्रयोग किया है, उसकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले समय जो दृश्य दिखाई दिए, वे विरोध की एक घटनाभर नहीं थे, वे देश के करोड़ों युवाओं की मनःस्थिति का आईना थे।

युवाओं का आक्रोश, शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग

हजारों छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही की मांग लेकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने पहुंचे थे। बाद में प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। देश का युवा गहरे असंतोष में है। आखिर यह गुस्सा आया कहां से? यह गुस्सा एक दिन में पैदा नहीं हुआ। यह उन वर्षों की निराशा है, जब लाखों युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए अपनी जवानी दांव पर लगा दी। यह उन परिवारों की चिंता है, जिन्होंने अपनी बचत बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दी।

यह उन युवाओं की पीड़ा है, है, जिन्हें हर परीक्षा के बाद यह डर सताता है कि कहीं फिर कोई विवाद, कोई गड़बड़ी या कोई अनिश्चितता उनके सपनों को अधूरा न छोड़ दे। देश का युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा, वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है। वह ऐसी ईमानदार व्यवस्था चाहता है, जहां उसकी मेहनत का मूल्य हो, जहां उसका भविष्य किसी लापरवाही या अव्यवस्था का शिकार न बने। लोकतंत्र में विरोध स्वाभाविक है। चिंता तब होती है, जब विरोध को सुनने के बजाय उसे कानून व्यवस्था की समस्या मान लिया जाता है। मीडिया का दायित्व सत्ता से प्रश्न पूछना भी है और समाज को तथ्यपरक जानकारी देना भी। मध्यम वर्ग अक्सर चुप रहता है।

युवाओं का भरोसा बचाना जरूरी, संवाद से दूर होगा आक्रोश

अपने बच्चों से कहता है- 'मेहनत करो, सब ठीक हो जाएगा।' लेकिन यदि मेहनत के बाद भी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो सबसे बड़ा संकट केवल युवाओं का नहीं, उस भरोसे का होता है जिस पर पूरा समाज टिका है। जंतर-मंतर पर खड़ा छात्र किसी और का नहीं, हमारे-आपके घर का बच्चा है।

उसकी चिंता को राजनीतिक चश्मे से नहीं, मानवीय दृष्टि से देखने की जरूरत है। केवल सत्तापक्ष ही नहीं सभी राजनीतिक दलों के लिए भी यह घटना एक संदेश है कि युवाओं का इस्तेमाल केवल चुनावी भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, यदि युवा केवल वोट बैंक बनकर रह जाएंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा मर जाएगी। भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है।

यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि यही पीढ़ी व्यवस्था से निराश होकर महसूस करने लगे कि उसकी आवाज सुनी नहीं जाती, तो यह केवल राजनीतिक चुनौती नहीं, राष्ट्रीय चुनौती बन जाएगी। सरकार संवाद का रास्ता चुने। पुलिस संवेदनशीलता और संयम बनाए रखे और समाज अपने युवाओं के साथ खड़ा हो।

किसी भी देश का भविष्य संसद की दीवारों से कम और उसके युवाओं की आंखों में ज्यादा लिखा होता है। उन आंखों में यदि उम्मीद बची रही, तो भारत का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। लेकिन यदि वहां केवल आंसू और आक्रोश रह गए, तो इतिहास हम सबसे कठिन प्रश्न पूछेगा।

युवाशक्ति भी उतरेगी मैदान में

लोकतंत्र संवाद का भी नाम है, जो सरकार विपक्ष और युवाओं से संवाद खो देती है, वह धीरे-धीरे भविष्य से भी संवाद खोने लगती है। पुलिस कानून लागू करती है, लेकिन लोकतंत्र में उसका दायित्व केवल भीड़ नियंत्रित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है। प्रदर्शन को दबाने या कुचलने के लिए पुलिस ने जिस तरह का बर्बर बल प्रयोग किया है, उसकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।

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