Jaipur Ganesh Temple Crowd: एआई, समय को मात देने को बेकरार है। पूरी दुनिया इसके खतरों को भांपकर इससे सतर्क रहने की बात कर रही है। यहां तक इसके माध्यम से इंसान की दुनिया में दखल देने की होड़ इस कदर मची है कि हर देश इसके लिए दीवानगी की हद तक जा रहा है।
चिप शरीर में लगाकर तमाम बातें जानी जा रही हैं और हम हैं कि 80 के दशक में जाने को बेताब हैं। हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि हम अपनी आस्था को भी भीड़तंत्र के हाथों गिरवी रखकर उस दौर में जा रहे हैं। हाल की जयपुर की एक घटना ने हमें अफवाहों की दुनिया का सिरमौर बना दिया है।
गणेश चतुर्थी पर जयपुर के मोती डूंगरी गणेश मंदिर में मेहंदी लेने वालों की इतनी भीड़ उमड़ी कि पूरे शहर की व्यवस्था ही बिगड़ गई। गणेश जी के सिंजारे की मेहंदी लगाने से शादी 6 माह में हो जाने की अफवाह कारण तकरीबन 18 लाख लोग पूरे भारत से आ जुटे।
मंदिर के महंत ने साफ कर दिया कि शादी वाली बात पूरी तरह से निराधार है। 2011 की जनगणना के अनुसार जयपुर शहर की आबादी 33.5 लाख और जयपुर जिले की आबादी 66.26 लाख थी। मतलब यह उस आबादी के हिसाब से लगभग आधा जयपुर शहर करीब 10 किलोमीटर में उपस्थित के था।
इस रील से फैली अफवाह के कारण जयपुर ही नहीं राजस्थान के हर गणेश मंदिर में जबरदस्त भीड़ जमा हो गई। इससे पहले सन 1995 में सितंबर माह में ही गणेश जी ने पूरे भारत में दूध पीया था और तब दूध कीमत से 20 गुना अधिक तक महंगा बिका था। सदी के आरंभ में दिल्ली में मंकी मैन की अफवाह किसने नहीं सुनी। अभिषेक बच्चन की फिल्म दिल्ली 6 इसी पर बनी है। थोड़ा और पीछे जाएं तो 1975 के बाद की स्थिति क्या थी? संतोषी माता, लक्ष्मी जी तथा हनुमान जी के नाम के 100 पोस्टकार्ड लिख डालिए, तो आपकी किस्मत खुल जाएगी ने धूम मचा दी थी। उस वक्त जब पोस्टकार्ड घर का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
कोरोना में धर्म विशेष के लोग टीका लगवाने से बचने लगे, पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। अफवाह थी कि इससे नपुंसकता आ जाएगी। भारत सरकार 14 वर्ष तक की लड़कियों को एचपीवी का टीका मुफ्त लगा रही है, जो महिलाओं को गर्भाशय, ग्रीवा के कैंसर से बचाएगा। मगर इसे लगवाने को लोग तैयार नहीं हैं। जयपुर की एक वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी का कहना है कि अफवाह है इससे बच्चे नहीं होंगे। कितनी अफवाहें हैं? चोटी कटवा, बच्चा चोर, 2000 के नोट में चिप होने से सारी जानकारी सरकार के पास चली जाएगी, मोम से बने चावल तथा दूसरी खाद्य वस्तुएं और भी न जाने क्या-क्या? सोशल मीडिया की ही कारस्तानी जून में मुंबई में देखने को मिली थी।
यहां के बेस्ट उपक्रम में भारी संख्या में नौकरी की बात जैसे ही फैली वहां पर आवेदन ही नहीं खुद बेरोजगार भी पहुंचने लगे। मामले को संभालने के लिए बेस्ट के अधिकारियों ने कहा कि यह फर्जी खबर है और ऐसी कोई भर्ती नहीं हो रही। भारत में पुलिस अफवाह फैलाने और शांति भंग करने के तहत सालाना 1500 तक बड़े कानूनी मामले दर्ज करती है। पीआईबी ने गत 3 वर्षों में अब तक 1200 से 1450 तक बड़ी अफवाहों को रोकने के लिए उनकी सत्यता बताई है। मनोचिकित्सक कहते हैं कि आजकल लोग विश्वास करने के मामले में बहुत जल्दी कर रहे हैं।
देश में इस समय जितनी अफवाहें आ रही हैं, वह एआई युग में एक अच्छा संदेश नहीं दे रहीं। यदि इस तरह की बातों को सीधे गणित से देखें तो बेरोजगारी तथा समयाभाव के कारण सब कुछ जल्दी पाने की लालसा भी इसका एक कारण है कि हम अपनी आस्था, समझ तथा सामाजिकता को अफवाहों पर कुर्बान कर रहे हैं। नौकरी के नाम पर हो रहा फ्रॉड, धर्म के लिए हर कहीं मिल रही सीख और भविष्य की जिम्मेदारियों को लेकर जो चिंता है, उसके कारण भी इस तरह की खबरों पर लोग अंधाधुंध विश्वास कर रहे हैं।
एआई के दौर में जब नौकरियों का संकट दिन-प्रतिदिन गहरा रहा है, तो भावनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। आम आदमी सुनी-सुनाई बातों पर अधिक विश्वास कर लेता है।
लेख- मनोज वार्ष्णेय के द्वारा