Indian Air Force Remains Ahead Of China In Global Ranking: भारतीय वायुसेना लगातार दुनिया की तीसरी सबसे शक्तिशाली वायुसेना बनी हुई है। इस साल डब्ल्यूडीएमएमए ने अपनी रैंकिंग का प्रारूप बदला है। इसके चलते असल में भारतीय वायुसेना छठे स्थान पर है पर शुरुआती दो पायदान पर अमेरिका के एयरफोर्स और नेवी काबिज है। फिर तीसरे नंबर पर रूस की वायुसेना तथा फिर चौथे और पांचवें नंबर पर अमेरिका की ही थल सेना और अमेरिकी मरीन सेना का कब्जा है।
चीनी वायुसेना सातवें स्थान पर है, लगातार दूसरे साल भारत से पीछे! भारत के पास विमानों की स्क्वाड्रन की संख्या आवश्यकता से कम है, भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन के मुकाबले केवल 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं। बहुत से विमान पुराने होते जा रहे हैं।
खरीदारी और आपूर्ति में देरी के चलते इन विमानों को नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों से बदला नहीं जा पा रहा और देश के भीतर विकसित होने वाले विमानों की खेप मिलने, तैनाती होने में अभी समय लगेगा। यदि युद्ध दो मोर्चों पर हो, जिसमें चीन भी शामिल हो, तो वायुसेना के लिए स्थिति विकट होगी।
इस रिपोर्ट में चीनी वायुसेना के पास कार्यरत जंगी जहाजी बेड़ों की भारी भरकम संख्या और टेक्निकल अपग्रेडेशन का भी जिक्र किया गया है। संख्या बल में चीन से आधी से भी कम होने के बावजूद भारतीय वायुसेना की रैंकिंग चीन से बेहतर है। कई पश्चिमी और चीनी थिंक टैंक इस आधार पर इसकी आलोचना करते हैं। क्योंकि यह पूरी तरह से गुप्त सैन्य डाटा या क्लासीफाइड आंकड़ों तक पहुंच नहीं रखता और ओपन-सोर्स इनपुट्स पर निर्भर करता है।
पर इस सबके बावजूद वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट की रैंकिंग को ओपन सोर्स इंटेलिजेंस और तमाम सैन्य एवं रक्षा विश्लेषकों के बीच काफी प्रतिष्ठित, सराहनीय इंडेक्स माना जाता है। क्योंकि यह 'क्वालिटी' अथवा गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करता है।
भारत की वायुसेना में केवल लड़ाकू विमान और उनकी संख्या ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स या परिवहन, हेलीकॉप्टर, रीफ्यूलर्स और अवाक्स अथवा हवाई चेतावनी प्रणाली जैसे 'फोर्स मल्टीप्लायर्स' का सही अनुपात आवश्यक है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत का फ्लीट चीन के मुकाबले अधिक संतुलित है। किसी वायुसेना की युद्धक क्षमता बनाए रखने, युद्ध के समय विमानों को लगातार उड़ान भरने के लिए कलपुजों की उपलब्धता और उनके रखरखाव, कठिन परिस्थितियों में आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने की क्षमता महत्व रखती है। भारत इस मामले में भी चीन से आगे है।
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जहां तक विमानों की वास्तविक मारक क्षमता, तकनीकी विविधता और अनुभव का प्रश्न है, भारतीय वायुसेना के पास पश्चिमी देशों के फ्रांसीसी रफाल, मिराज-2000, रूसी सुखोई 30 एमकेआई, मिग-29 और स्वदेशी तेजस, तकनीकों का इसे बहुमुखी बनाने में समर्थ संयोजन है। चीन काफी हद तक अपनी स्वदेशी री-इंजीनियरिंग और रूसी डिजाइन पर निर्भर है, जिसकी वास्तविक युद्ध प्रभावशीलता अभी पूरी तरह परीक्षित नहीं है।
चीन ने 1950 के बाद कोई वास्तविक जंग नहीं लड़ी, जबकि भारतीय वायुसेना के पास दो पूर्ण युद्ध और कई सैन्य ऑपरेशन का तजुबाँ है, तकनीकों का आधुनिक स्तर और स्वदेशी रक्षा उत्पादन की क्षमता में भारत पीछे नहीं है। ऊंचाई पर हवा का घनत्व होने के चलते चीनी लड़ाकू विमान अपनी पूरी क्षमता के साथ भारी मात्रा में हथियार और ईंधन लेकर उड़ान नहीं भर सकते। जबकि भारतीय विमान अपनी फुल पेलोड क्षमता के साथ उड़ान भर सकते हैं। इसके अलावा भारत को ब्रह्मोस और अख जैसे बेहतर मिसाइल तकनीक, लड़ाकू पायलटों की उच्च स्तरीय ट्रेनिंग, चीन के 'पायलट-टू-एयरक्राफ्ट रेशियो' और ट्रेनिंग के मुकाबले में बढ़त देती है।
-लेख संजय श्रीवास्तव द्वारा